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जगदंबिका ने छोड़ा 'हाथ' का साथ

Sat, 08 Mar 2014 01:06 PM IST
टीम डिजिटल/अमर उजाला, लखनऊ
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जगदंबिका पाल ने आखिरकार कांग्रेस का हाथ छोड़ दिया है। इसके साथ ही पिछले कई दिनों से चल रही अटकलबाजी पर भी विराम लग गया है कि वह सिर्फ कांग्रेस में अपनी स्थिति मजबूत करने के लिए ऐसा कर रहे हैं।
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शुक्रवार को अपने आवास पर जगदंबिका पाल ने प्रेस कांफ्रेंस बुलाकर यह एलान किया। उन्होंने लोकसभा की सदस्यता से भी त्यागपत्र दे दिया है।

हालांकि, उन्होंने अभी इस बात का खुलासा नहीं किया है कि वह किस पार्टी का दामन थामने की तैयारी में हैं।

जगदंबिका ने एक सवाल के जवाब में बताया कि वह आगे का फैसला अपने समर्थकों से विचार-विमर्श करने के बाद ही करेंगे। हालांकि, सूत्रों की मानें तो जगदंबिका का भाजपा में जाना लगभग तय है।
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कांग्रेस में किराएदार बन गए मकान मालिक

जगदंबिका पाल ने लखनऊ आकर एक प्रेस कांफ्रेंस में कहा कि वे दुखी मन से कांग्रेस छोड़ रहे हैं।

पाल ने कहा कि अब कांग्रेस में उनकी जरूरत नहीं रह गई है, इसीलिए उन्होंने पार्टी छोड़ी है। पाल ने कहा, अब आलाकमान से न सीधे बात हो पाती है और न ही उन्हें हमारी कोई फिक्र रहती है।

पाल ने यह भी कहा कि पार्टी में अब किराएदार मकान मालिक बन गए हैं और उन लोगों की कोई कद्र नहीं रह गई है, जिन्होंने कांग्रेस को खड़ा किया था।

हालांकि, पाल ने किसी नेता पर सीधे कोई इल्जाम नहीं लगाया पर उनकी बात से ये तो जाहिर हो गया कि कांग्रेस में राहुल की कार्यशैली से एक बड़ा वर्ग नाखुश है।

भाजपा में शुरू हो चुकी खेमेबाजी

पता नहीं जगदंबिका पाल बदले या भाजपा, लेकिन सियासी गलियारों में जगदंबिका पाल व राजनाथ सिंह की मुलाकात की खबरों ने हलचल मचा दी थी।

हलचल भाजपा के भीतर भी कम नहीं। खुलकर भले ही कोई कुछ नहीं बोल रहा हो लेकिन भीतर ही भीतर पाल के समर्थन व विरोध में खेमेबाजी चल रही है।

कुछ को अतीत में भाजपा की जड़ों में मट्ठा डाल चुके पाल को पार्टी में लेने पर आपत्ति है तो कुछ का तर्क है कि इससे कांग्रेस में भगदड़ मचने का संदेश जाएगा।

इससे मोदी की हवा को और रफ्तार मिलेगी। हालांकि एक तबका ऐसा भी है जो पाल के बदलते दिल पर दिल से भरोसा नहीं कर पा रहा है।

आशंका, इसके पीछे कोई गहरी चाल

इस तबके को आशंका है कि बदलते माहौल में पाल का यह नया खेल है। वह भाजपा में जाने का संदेश देकर कांग्रेस नेतृत्व पर दबाव बनाना चाह रहे हैं, जिससे संजय सिंह की तरह कांग्रेस पर उनका दबाव और दबदबा पहले जैसा हो जाए।

भाजपा ही नहीं पाल के नजदीकी सूत्रों की मानें तो वह बहुत जल्द भगवा चोला धारण कर सकते हैं। बात सिर्फ यह फंसी है कि पाल को पार्टी किस सीट से लड़ाए।

दरअसल, पाल जहां से सांसद हैं, वहां से भाजपा के एक वरिष्ठ नेता जो कि विधायक भी हैं चुनाव लड़ना चाहते हैं। इसलिए भाजपा चाहती है कि पाल को किसी दूसरी ऐसी सीट से लड़ाया जाए जहां से पार्टी की तरफ से राजनीतिक संदेश दिया जा सके।

साथ ही पूर्वांचल के सामाजिक समीकरणों में ठाकुरों के फैक्टर को ठीक किया जा सके।

अटल को करारा झटका दे चुके हैं पाल

जगदंबिका पाल के भाजपा में आने की खबरों के साथ ही लोगों की आंखों के सामने पाल और भाजपा की दोस्ती के दुश्मनी में बदलने की घटना घूमने लगी है।

20 फरवरी 1998 की बात है। वर्ष 1998-99 में कल्याण सिंह के मुख्यमंत्रित्व काल में जगदंबिका पाल भाजपा गठबंधन की सरकार में ही मंत्री थे। अगले दिन लोकसभा चुनाव का दूसरे या तीसरे चरण का मतदान होना था।

मुलायम सिंह यादव भी लोकसभा चुनाव लड़ रहे थे। पाल अचानक राजभवन पहुंच गए और तत्कालीन राज्यपाल रोमेश भंडारी को लोकतांत्रिक कांग्रेस का कल्याण सरकार से समर्थन वापसी का पत्र सौंप दिया।
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जब बने थे एक दिन के सीएम

पाल ने दावा ठोंक दिया कि उन्हें समाजवादी पार्टी ने समर्थन दे दिया है। राज्यपाल ने पाल के दावे पर यकीन करते हुए उन्हें मुख्यमंत्री घोषित कर दिया। सियासी तूफान खड़ा हो गया।

अटल बिहारी वाजपेयी विशेष विमान से सीधे लखनऊ पहुंचे। उच्च न्यायालय से होता हुआ मामला सर्वोच्च न्यायालय तक पहुंच गया। न्यायालय ने कल्याण सिंह को ही मुख्यमंत्री माना। जगदंबिका पाल मुख्यमंत्री की कुर्सी छोड़ने को तैयार नहीं हुए।

हालांकि बाद में सदन में विश्वासमत के दौरान लोकतांत्रिक कांग्रेस के ही कई साथी उनसे अलग हो गए और वे पराजित हो गए।
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