आईटीआई के पाठ्यक्रमों में घुला परंपरा का रंग, मिला तकनीक का संग
लखनऊ। अब आईटीआई सिर्फ मशीनों और मोटर का ज्ञान नहीं देगा, बल्कि अब चूल्हा-चौका, बुनाई-कढ़ाई, लकड़ी की नक्काशी और फुलकारी जैसे पारंपरिक हुनर भी टेक्नोलॉजी के संग सिखाएगा। जी हां! कौशल विकास की दुनिया में एक नया अध्याय जुड़ने जा रहा है। हैंडीक्राफ्ट और एग्रीकल्चर से जुड़े आठ नए व्यावसायिक कोर्स राजकीय औद्योगिक प्रशिक्षण संस्थानों (आईटीआई) में शुरू होने जा रहे हैं... और ये होंगे तकनीक के रंग में रंगे हुए। परंपरा की पूंजी को आधुनिकता की तकनीक से जोड़कर, युवाओं को न केवल रोजगार मिलेगा, बल्कि गांव और कस्बों की संस्कृति को भी मिलेगा एक नया मंच।
मिट्टी की महक, कला की रेख और तकनीक की धार
अब तक औद्योगिक मांग के हिसाब से चल रहे आईटीआई कोर्स अब स्थानीय पारंपरिक कारीगरी की ओर रुख कर रहे हैं। प्रशिक्षण महानिदेशालय (डीजीटी) ने इन कोर्सों को औपचारिक मंजूरी दे दी है और नए सत्र से छात्रों को मिलेगा ऐसा प्रशिक्षण जो रोजगार भी देगा और हमारी सांस्कृतिक विरासत को भी संजोएगा।
रोजगार की चाबी अब कारीगरी के पास
अलीगंज राजकीय आईटीआई के प्रधानाचार्य राजकुमार यादव कहते हैं, हर हाथ में हुनर, हर घर में रोजगार – यही है इस पहल का मकसद। ये कोर्स खासतौर पर उन विद्यार्थियों के लिए सुनहरा मौका हैं जो स्वरोजगार की ओर बढ़ना चाहते हैं। ग्रामीण और पारंपरिक शिल्प में रुचि रखने वाले युवाओं को अब तकनीकी जानकारी के साथ व्यावसायिक प्रशिक्षण भी मिलेगा।
ये हैं हुनर के नए पाठ्यक्रम जो बदलेंगे तस्वीर:
बसोहली चित्रकला कलाकारी,
कालीन बुनाई व हथकरघा कारीगरी,
हस्त कढ़ाई कारीगरी,
शॉल बुनाई और लकड़ी की नक्काशी
पेपर माशी कारीगरी
पारंपरिक फुलकारी कारीगरी
नर्सरी तकनीशियन – मिट्टी से उगता भविष्य
बाग तकनीशियन – हरियाली का विज्ञान