उत्साह के सहारे चुनौतियों से निपटने के एजेंडे के साथ समाजवादी पार्टी का नौवां राष्ट्रीय अधिवेशन बुधवार सुबह यहां जनेश्वर मिश्र पार्क में शुरू होगा। पिछला अधिवेशन 2011 में आगरा में हुआ था। आगरा से लखनऊ के अधिवेशन तक की यात्रा में न सिर्फ सूबे के राजनीतिक परिदृश्य में काफी बदलाव आ चुका है बल्कि खुद सपा की स्थिति काफी बदल चुकी है।
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तब राष्ट्रीय अधिवेशन सपा को सत्ता दिलाने और बसपा सरकार की विदाई के संकल्प के साथ हुआ था। इस बार वह खुद सरकार में है। इस नाते जहां उसको अपने कामकाज के आधार पर 2017 के चुनाव में वोट हासिल करने का इंतजाम करना है तो वहीं विपक्ष के आरोपों का जवाब भी देना है।
खासतौर से कानून-व्यवस्था के मुद्दे पर सरकार के चेहरे पर लगे दागों को धोने की चुनौती भी उसके सामने खड़ी है। दूसरी तरफ केंद्र में धुर विरोधी भाजपा व नरेंद्र मोदी की सरकार को घेरने की रणनीति भी तैयार करनी है।
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लखनऊ अधिवेशन में सपा की भावी चुनौतियों से पार पाने के क्या इतंजाम होते हैं, यह तो इसका समापन होने के बाद पता चलेगा। पर, विधानसभा के 11 सीटों के उपचुनाव ने सपा को आठ सीटें दिलाकर भविष्य की चुनौतियों से निपटने के लिए जमीन मुहैया करा दी है, जिस पर पैर टिकाकर वह आगे की यात्रा कर सकती है।
रिकॉर्ड बनाना एक मकसद
हालांकि, अधिवेशन में लोकसभा चुनाव में हुई करारी शिकस्त पार्टी की चिंताओं में शामिल रहेगी। पर, विधानसभा सीटों के उपचुनाव नतीजों के आधार पर सपा अब यह दावा करने की स्थिति में है कि लोकसभा चुनाव में भले ही उसे शिकस्त मिली हो लेकिन उसकी जमीन बरकरार है।
मेहनत करके 2017 के चुनाव में सपा को दोबारा सत्ता में लाकर बहुत दिनों बाद एक ही दल की प्रदेश में दूसरी बार सरकार बनाने का रिकॉर्ड समाजवादी पार्टी के नाम किया जा सकता है। उपचुनाव के नतीजों के सहारे वह कार्यकर्ताओं में भी हौसला भरने की स्थिति में भी आ गई है।
इन मुद्दों पर होगी चर्चा राष्ट्रीय अध्यक्ष के चुनाव की परंपरा के अलावा अधिवेशन में प्रमुख रूप से दो प्रस्ताव रखे जाएंगे। एक राजनीतिक और दूसरा आर्थिक। आर्थिक प्रस्ताव में ही खेती-किसानी की चुनौतियों पर बात होगी। साथ ही सपा यह बताएगी कि प्रदेश में सरकार बनने के बाद उसने इस बारे में क्या-क्या किया। साथ ही केंद्र सरकार को घेरने वाले मुद्दों को धार देने की कोशिश होगी।
खासतौर से चीन की घुसपैठ, पाकिस्तान की तरफ से बार-बार किए जा रहे सीजफायर के उल्लंघन के साथ ही महंगाई, बिजली आपूर्ति जैसे मुद्दों पर। अधिवेशन मे राज्यपालों की भूमिका पर भी चर्चा होने की संभावना है। अधिवेशन मोदी के अक्स में यूपी में भाजपा की मजबूती की संभावनाओं को भी खत्म करने के उपाय तलाशने की कोशिश करेगी।
कुछ खोया तो कुछ पाया
कुछ खास बातें और हैं। आगरा से लखनऊ की यात्रा में सपा ने कुछ पाया तो कुछ खोया भी है। पार्टी को सत्ता मिली। उसकी पूर्ण बहुमत से सरकार बनी। पर, लोकसभा चुनाव में पार्टी को ऐसा झटका लगा, जिसकी कल्पना सपा नेताओं ने कभी नहीं की होगी। इस दौरान कुछ नेता भी पार्टी ने खोए है। सपा की स्थापना के बाद पहली बार अधिवेशन के मंच पर बृजभूषण तिवारी और मोहन सिंह जैसे समाजवादी नेता नहीं होंगे।
जाहिर है कि प्रस्ताव पर तार्किक सवाल खड़े करने वालों की कमी खलेगी। अलबत्ता इस बीच मो. आजम खां जरूर पार्टी को मिल चुके हैं। जिनकी मौजूदगी व टिप्पणियां अधिवेशन में जरूर सुनाई दे सकती हैं। कुछ और भी बदलाव हुए है। अमर सिंह अभी पार्टी में नहीं आए हैं लेकिन उनकी सदेच्छाएं सपा के साथ जुड़ चुकी हैं।
पीढ़ीगत बदलाव की छाप राष्ट्रीय अधिवेशन तमाम बदलाव समेटे होगा। इसकी छाप अधिवेशन पर दिखेगी। 2011 में सपा के मुख्य किरदार मुलायम सिंह यादव ही थे। पर, इस बार मुख्यमंत्री होने के नाते अखिलेश यादव भी मुख्य भूमिका में दिख सकते हैं।
अखिलेश को सत्ता की चाबी और राजनीतिक विरासत सौंपने के बाद इस अधिवेशन में यह बात भी देखने वाली होगी कि दिल्ली में मोदी की सरकार से मोर्चा लेने के लिए मुलायम अपने साथ किसे खड़ा करते हैं। यही नहीं, खास बात और होंगी। अभी तक मुलायम की दो पीढ़ियां ही राजनीतिक गतिविधियों में दिखती थीं।
इस बार मुलायम के खाते में परिवार की तीसरी पीढ़ी पौत्र तेजप्रताप सिंह यादव के रूप में तीसरी पीढ़ी को भी राजनीति में मुकाम पर पहुंचाने की उपलब्धि है। साथ ही बहू डिंपल यादव को संसद में पहुंचाने की कामयाबी भी। अखिलेश की अगुवाई में यह चेहरे सक्रिय भूमिका में दिख रहे हैं।
पीढ़ीगत बदलाव की छाप सिर्फ चेहरों तक सीमित नहीं है बल्कि अधिवेशन की तैयारियों पर भी इसकी झलक दिखने लगी है। इंजीनियर मुख्यमंत्री की देखरेख में हुए अधिवेशन के इंतजामों में सजावट से लेकर रोशनी और साउंड तक के सिस्टम में अत्याधुनिक तकनीक का प्रयोग हुआ है।
नजरें 2017 पर वैसे तो विधानसभा के आगामी चुनाव में अभी दो वर्ष से ज्यादा का वक्त बचा है। पर, सपा के राष्ट्रीय अधिवेशन की बात करें तो उसकी भूमिका इसी अधिवेशन में ही तैयार होने के संकेत हैं। जाहिर है कि अधिवेशन के सामने विचारणीय विषयों में अखिलेश सरकार के कामकाज और उपलब्धियां जरूर शामिल होंगी।
साथ ही शामिल होंगी कानून-व्यवस्था, सांप्रदायिक तनाव, महिलाओं के उत्पीड़न पर सरकार को कठघरे से निकालने की चिंता और इनके चलते सपा पर लगने वाले आरोपों से मुक्ति के उपाय तलाशने की कोशिश। वैसे तो सपा मुखिया सपा के सरकार में आने के बाद से ही उसे इन मुद्दों पर नसीहत देते रहे हैं। राष्ट्रीय अधिवेशन में भी मुलायम की यह चिंता झलकेगी।