कोरोना संक्रमण के दौर में बीते 19 दिनों से बंद चल रहे लखनऊ जू पर वेतन और खुराक दोनों का संकट आ सकता है। दर्शकों के न आने से जू की आय बंद है। एक ट्रस्ट होने के चलते इसके अधिकतम खर्चे टिकट खरीद से ही पूरे होते हैं।
अगर लॉकडाउन की अवधि बढ़ी तो जू के स्टाफ के वेतन के साथ आने वाले दिनों में वन्यजीवों की खुराक पर भी संकट आ सकता है। लगभग 72 एकड़ में फैले जू में 90 से अधिक प्रजातियों के एक हजार से अधिक वन्यजीव हैं।
वन्यजीवों की देखरेख के स्टाफ के अलावा चिकित्सक, सपोर्टिंग स्टाफ और प्रशासकीय स्टाफ मिलाकर करीब 200 अधिकारी व कर्मचारी हैं। इनके वेतन पर ही 60 लाख के आसपास तक खर्च होता है।
जू की टिकट से मासिक आय करीब 75 लाख रुपये है। सरकार से हर साल जू को छह करोड़ रुपये अनुदान मिलते हैं। जू प्रशासन के मुताबिक, जू के वन्यजीवों की खुराक, वेतन समेत अन्य खर्च हर माह करीब सवा करोड़ रुपये हैं।
एक ट्रस्ट होने के नाते तमाम खर्चे टिकटों की बिक्री से होने वाली आय पर ही निर्भर है। 16 मार्च से जू बंद है। आय शून्य है। ऐसे में बजट बिगड़ न जाए, इसको लेकर हम अधिकारियों से बजट मांगने की तैयारी कर रहे हैं। अभी जू को मिलने वाली राशि भी नहीं आई है।
लॉकडाउन के चलते लखनऊ जू में वन्यजीव दर्शकों से दूर हैं। जू का शांत माहौल भी उनके लिए एक नया अनुभव है। हालांकि जू के चिकित्सक डॉ. अशोक कश्यप बताते हैं कि वन्यजीवों के लिए आदमियों से घुलना-मिलना आसान नहीं होता।
शेर व बाघ जैसे बड़े जानवर कीपर को ही पहचानते हैं। उन्हीं को रिस्पॉन्स करते हैं। चिम्पैंजी या बंदर प्रजाति जरूर मानवीय गतिविधियों पर रिस्पांस करते हैं। वहीं निदेशक जू आरके सिंह ने बताया दिन में राउंड लेने के दौरान और वन्यजीव तो कोई खास गतिविधि नहीं दिखाते, लेकिन जेसन चिंपैंजी टहलता हुआ बाड़े के किनारे चला आता है।
शेर, बाघ तेंदुआ या हिरण प्रजाति के वन्यजीव अपने स्वभाव के चलते मानवीय गतिविधियों से दूर रहते हैं। ऐसे में बंदी के चलते दर्शकों के ना आने पर वह अपनी प्रकृति का ही आनंद ले रहे हैं।
डॉ. अशोक ने बताया कि हुक्कू बंदर कालू अपवाद कहा जा सकता था। उसे दर्शकों की आवाज और बोली पर जवाब देने की आदत थी। इसीलिए वह दिनभर लोगों की आवाज पर जवाब दिया करता था।