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यूपी में दिक्कत न खड़ी कर दे मोदी की 'मां'

Sun, 20 Oct 2013 07:47 PM IST
कुमार भवेश चंद्र/लखनऊ
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प्रधानमंत्री पद के लिए पार्टी के उम्मीदवार नरेंद्र मोदी की कानपुर रैली के साथ भाजपा ने यूपी में अपने चुनावी अभियान का आगाज कर दिया।
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यूपी में इस रैली में मोदी ने एक मां की कहानी सुनाई। यह कहानी राहुल के मां की नहीं थी। यह कहानी थी यूपी के एक आम आदमी की मां की।

ऐसा लगता है नेताओं के पास अब केवल कहानियां हैं। और वे इन कहानियों के बदले ही वोट चाहते हैं।

मोदी की मां की कहानी पर चर्चा से पहले यह बताना जरूरी है कि कानपुर की रैली का इंतजार भाजपा के साथ दूसरे दलों और आम वोटर भी जरूर रहा होगा। ऐसा इसलिए भी क्योंकि पार्टी की ओर से इसको लेकर बड़े बड़े दावे किए जा रहे हैं, सपने देखे और दिखाए जा रहे हैं।

प्रधानमंत्री के रूप में उनकी उम्मीदवारी और दावेदारी के साथ मोदी के  यूपी में आकर चुनाव लड़ने को लेकर भी पार्टी के बड़े-बड़े सपने है।

प्रदेश में भाजपा का ग्राफ एक बार फिर बहुत ही ऊपर जाते देखा और बताया जा रहा है। मोदी की रैलियों में दूसरे दलों और आम वोटरों की उत्सुकता और दिलचस्पी इसी लिहाज से है।
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कानपुर रैली के बाद सबसे बड़ा सवाल यही है कि क्या रैली में मोदी अपना एजेंडा लोगों के सामने रख पाए? क्या वह कमजोर होती जा रही कांग्रेस नीत केंद्र सरकार के खिलाफ अपनी मुहिम को आगे बढ़ाते हुए कोई ऐसी तस्वीर पेश कर पाए, जिसके आधार पर आम वोटर उनको या उनकी पार्टी के उम्मीदवारों को वोट करेंगे?

किस आधार पर आगे आएंगे कार्यकर्ता
हम ये तो मानकर चल ही रहे हैं कि भाजपा के वोटर उन्हें वोट करेंगे। ऐसा नहीं मानने की कोई वजह भी नहीं है। सवाल उठता है कि प्रदेश में नेतृत्व और बड़े नेताओं की आपसी संघर्ष से संकट से जूझ रही उनकी पार्टी के कार्यकर्ता किस आधार पर एकजुट होकर अपने उम्मीदवारों की मदद के लिए आगे आएंगे?

पार्टी कार्यकर्ताओं में जोश की बात तो समझ में आती है, लेकिन सियासी तैयारी और रणनीति के तौर पर पार्टी और कार्यकर्ताओं के बीच का तालमेल अभी बहुत दुरुस्त नहीं माना जा रहा है।

भाजपा ने प्रदेश में अध्यक्ष बदलकर एक नया चेहरा जरूर सामने कर दिया है लेकिन उसे यह जरूर याद रखना होगा कि किन वजहों से उनका प्रदेश अध्यक्ष 2012 का विधानसभा चुनाव तक नहीं जीत पाए थे?

कानपुर में मोदी की रैली अपने कार्यकर्ताओं में कितना जोश भर पाया इस बारे में पक्के तौर पर कुछ कहना मुनासिब नहीं लेकिन कांग्रेस का विकल्प तलाश रहे आम वोटरों के लिए उनकेसंदेश  स्पष्ट नहीं थे या कहें कि निराशा भरे थे।

घिसे-पिटे थे मोदी के वार
कांग्रेस से लेकर सपा और बसपा पर नरेंद्र मोदी ने जो वार किए वह घिसे पिटे थे। उन्होंने कोई ऐसी बात नहीं कही जो किसी दूसरी रैलियों में दूसरे शब्दों में नहीं कह चुके हैं। यूपी की भूमि से उनकेचुनाव लड़ने और प्रधानमंत्री बनने केदावे करने की वजह से यहां की आम जनता की उम्मीदें भी निश्चित रूप से उनसे जुड़ गई है।

कानपुर रैली के मंच से वह उम्मीद को लेकर बहुत सजग, सचेत नहीं दिखे। यह सजगता मां की उनकी कहानी से भी नदारद थी। और तो और गुजरात में विकास और सुरक्षा की सुनहरी तस्वीर पेश करने केचक्कर में उन्होंने जो मां कहानी बयां की है वह उनकेखिलाफ प्रयोग की जा सकती है।

मोदी यूपी से गुजरात की यात्रा करने वाले की इस मां का जिक्र करते हुए यह कह गए कि ट्रेन केगुजरात पहुंचने पर ही मां को चैन मिलता है। इस तरह क्या वे एक तरह से यूपी का अपमान नहीं कर गए?

क्योंकि सवाल सिर्फ इस बात का नहीं कि यहां की सरकार सुरक्षा नहीं दे पा रही। सवाल ये भी है कि क्या यूपी में सिर्फ चोर और लुटेरे हैं जो ट्रेन में चलते लोगों को चैन से यात्रा तक नहीं करने देते?
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ताज मिलने से पहले ही न छिन जाए
मेरी राय में कहानी का यह पक्ष सोचे बगैर उन्होंने एक तरह से पूरे यूपी का अपमान कर डाला। नरेंद्र मोदी के तरकस में अपने सियासी विरोधियों के लिए ढेर सारे तीर हैं, जिनका वे लगातार इस्तेमाल भी कर रहे हैं। उन्हें यह तो समझना ही होगा कि आम जनता के पास वह तीर है, जो किसी से भी प्रधानमंत्री का ताज भी छीन सकता है।

अभी तो वह इस पद के उम्मीदवार भर हैं।
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