क्या आजम खां बदल रहे हैं? या बदलते हुए दिखना चाहते हैं? आखिर कौन सा दबाव था, जो वे राजा भैया की देहरी पर पहुंच गए?
जो खुद आजम हों, नाम से भी व्यवहार से भी। वजीर होने की अहमियत जताने से कभी न चूकें। बात-बेबात कोपभवन पहुंच जाए। कैबिनेट का बायकॉट कर दें। वही शख्स ‘राजा’ के ‘दर’ पर पहुंचेे, तो आश्चर्य होना स्वाभाविक ही है।
दोनों को नजदीक से जानने-समझने वालों के लिए भी यह बदलाव पहेली बना है। दोनों की एक-दूसरे को लेकर क्या राय है, यह किसी से छिपी नहीं है।
राजा भैया को मंत्रिमंडल में लेने-निकालने का मसला हो या आस्थान में बवाल अथवा सीओ जिया उल हक का कत्ल, दोनों के रिश्तों की तल्खी का आलम जगजाहिर है। बातें क्या हुईं, इस पर दोनों का मौनव्रत है।
हालांकि नजदीकियों ने बताया कि खां साहब ने जश्न-ए-जौहर के न्यौते के साथ मुजफ्फरनगर में अमन बहाली के लिए मदद भी मांगी है।
लेकिन, दो घंटे बस यही हुआ होगा? यह सोचने वाली बात है। हालांकि बड़बोले यह भी दावा कर रहे हैं कि ताजा बीमारी के दौरान आगरा से जो हाईडोज मिली थी, उसका असर भी हो सकता है।