तनु वेड्स मनु रिटर्न्स फिल्म को देख रहे हर दर्शक के मन में क्लाइमेक्स तक यह धुकधुकी बनी होती है कि मनु आखिरकार दत्तों से शादी कर लेगा या फिर उसकी जिंदगी में तनु उर्फ तनुजा त्रिवेदी लौट आएंगी। दर्शकों ने जिस तरह की धुकधुकी और बेचैनी फिल्म देखते हुए महसूस की कुछ वैसे ही बेचैनी, कश्मकश और भ्रम इस फिल्म के लेखक और निर्देशक के मन में भी बना रहा जब वह इस सीन का अंतिम ड्राफ्ट तैयार कर रहे थे।
हिट होकर पूरे देश में चर्चा बटोरने वाली फिल्म तनु वेड्स मनु रिटर्न्स के निर्देशक आनंद एल राय और फिल्म के लेखक हिंमाशु शर्मा सोमवार को लखनऊ अमर उजाला के मेहमान थे। वहां ये फिल्म हिट होने की खुशी साझा करने आए थे।
फिल्म के क्लाइमेक्स से जुड़े सवाल पर आनंद एल राय, हिंमाशु का चेहरे देखते हैं और फिर उन्हें ही जवाब देने के लिए आगे कर देते हैं। हिंमाशु कहते हैं कि यह दुविधा हमारे मन में भी थी कि आखिरकार हम दत्तों को मनु के साथ मिला दें या मनु के पास तनु फिर से लौट जाए।
लेकिन जब हम पूरी फिल्म में मनु के चरित्र को देखते हैं तो महसूस होता है कि मनु पूरी फिल्म में सिर्फ तनु को चाहता है। वह दत्तों में भी मनु को ही खोजता है। उसके मन की दुविधाएं भी उसी समय शुरू होती है जब दत्तों और तनु एक साथ आकर खड़ी हो जाती हैं। हमने इस फिल्म के क्लाइमेक्स को मनु के नजरिए से देखने की कोशिश की। दत्तों का भी पक्ष हो सकता है लेकिन यह फिल्म दरअसल तनुजा और मनोज शर्मा की ही कहानी थी।
'तनुजा' का जवाब 'दत्तो' ही थी
मनु शर्मा को एक और लड़की ऐसे भी मिल सकती थी जो तनुजा त्रिवेदी की ही तरह सोचती हो। उसकी तरह ही बेपरवाह और अक्खड़ हो लेकिन शायद ऐसी लड़की पर्दे पर तनुजा त्रिवेदी को मात नहीं दे सकती थी।
परदे पर दत्तों ही तनुजा को हरा सकती थी। जो मिजाज और चरित्र में तनुजा के ठीक उल्टी खड़ी थी। फिल्म देखते ही दर्शक यह बात महसूस भी करेंगे कि तनुजा त्रिवेदी मनु शर्मा पर तो हावी दिखती हैं लेकिन दत्तों पर उनका कोई असर नहीं होता।
हरियाणा के एक गांव में जाने की वजह यही थी कि एक अलग तरह की लड़की से तनुजा का सामना कराया जाए। वरना एक और प्रेम संबंध तो मनु शर्मा विदेश में ही कर लेते और तनु जैसी दिखने वाली लड़की भी उन्हें वहां मिल जाती। या फिर उन्हें ठेठ दिल्ली में रहने वाली कोई लड़की मिल जाती।
तब नहीं सोची थी कि सीक्वल बनेगा
आनंद एल राय कहते हैं कि जब तनु वेड्स मनु बनी और उसके बाद हिट हुई तब नहीं सोचा गया था कि इसका सीक्वल बनेगा। मैं और हिंमाशु दोनों ही रांझणा पर लग गए। हां, कभी कभी आइसक्रीम खाते-खाते हम इस बारे में बात करते कि तनु वेड्स मनु में आगे कुछ हो सकता था क्या?। लेकिन हम कभी आगे नहीं बढ़ पाए।
एक निर्देशक के रूप में यह मेरी और एक लेखक के रूप में यह हिंमाशु की तरक्की है कि हम चार साल बाद इस फिल्म को ऐसा पेश कर पाए। जब फिल्म बनी तो कहानी के ढंग से इतनी मौलिक और नई हो गई कि लगा कि हमने एक बिल्कुल नई फिल्म बना ली।
तनु वेड्स मनु रिटर्न्स के किरदारों पर बात करते हुए आनंद और हिंमाशु ने कहा कि चूंकि कहानी अपना विस्तार करती है इसलिए हमे लगा कि हमने हूबहू वही किरदार रख लिए।
छोटे शहरों का सिनेमा
निर्देशक आनंद एल राय और इस फिल्म के लेखक हिंमाशु शर्मा के अनुसार, फिल्म हिट होगी या फ्लॉप इसका फैसला छोटे शहर करने लगे हैं, तो फिर कहानियां ऐसे शहरों की क्यों न कही जाएं?
हिंमाशु कहते हैं कि अब वो दिन नहीं रहे जब दिल्ली और मुंबई का दर्शक मल्टीप्लेक्सों में महंगी टिकट खरीदकर फिल्म देखे और छोटे शहरों का दर्शक सिंगल स्क्रीन सिनेमा में 20 रुपए के टिकट में। अब छोटे शहरों की भी फिल्म को हिट या फ्लॉप कराने में बराबर की भागीदारी होती है।
लगातार तीसरी बड़ी हिट का स्वाद चख चुके आनंद एल राय कहते हैं कि सिनेमा में ऐसी कहानी होनी चाहिए जो लोगों को उनके बीच की लगे। तनु वेड्स मनु और इसकी सीक्वल फिल्म के अलावा रांझणा भी छोटे शहर की फिल्म है।