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मातृ भाषा की रूह हैं क्षेत्रीय बोलियां

Sat, 22 Feb 2014 12:43 PM IST
ब्यूरो/अमर उजाला, लखनऊ
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अगर हिंदी से क्षेत्रीय बोलियों को निकाल देंगे तो मातृभाषा की क्या स्थिति होगी।
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इसका अंदाजा आसानी से लगाया जा सकता है। बोलियां मातृ भाषा की रूह हैं। यह कहना है वरिष्ठ साहित्यकार मदन मोहन मनुज का।

वे शुक्रवार को भारतीय लेखिका परिषद की ओर से अंतरराष्ट्रीय मातृभाषा दिवस पर चारबाग स्थित बाल संग्रहालय में आयोजित साहित्यिक गोष्ठी में बतौर मुख्य अतिथि बोल रहे थे।
ऊषा चौधरी ने कहा कि मातृभाषा पहली भाषा होती है, जो एक बच्चा अपनी मां से सीखता है। दुनिया भर के देशों ने अपनी मातृ भाषा को राष्ट्र भाषा के रूप में अपनाया है, लेकिन हिंदुस्तान में ऐसा नहीं किया जा सका है।
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संगोष्ठी की अध्यक्षता परिषद की अध्यक्ष स्वरूप कुमारी बख्शी ने की। इस मौके पर डॉ. ऊषा राय, अलका प्रमोद, अनीता श्रीवास्तव भी मौजूद रहीं।

उधर, निखिल भारत बंग साहित्य सम्मेलन की ओर से बंगाली क्लब में कार्यक्रम आयोजित कर उन शहीदों को याद किया गया, जिनकी स्मृति में अंतरराष्ट्रीय मातृभाषा दिवस मनाया जाता है।
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