सत्ता से कांग्रेस की विदाई के दावे के साथ चुनावी जंग में उतरी भारतीय जनता पार्टी प्रत्याशियों की घोषणा पर मात खा गई।
कांग्रेस ने सूबे में लोकसभा की 50 सीटों के उम्मीदवार मैदान में उतार दिए हैं लेकिन भाजपा की ओर से सीटों पर मतभेद बना हुआ है।
भाजपा डॉ. मुरली मनोहर जोशी की वाराणसी और लालजी टंडन की लखनऊ सीट पर ऐसा उलझी कि बैठक बिना किसी फैसले के समाप्त हो गई।
इसी के साथ एक बात फिर सामने आ गई कि यूपी में भाजपा नेताओं के झगड़े जल्द खत्म होने वाले नहीं है।
मोदी के लिए कौन खड़ी कर रहा है मुश्किलें
कुछ लोग यह सवाल भी उठा रहे हैं कि आखिर चेहरे बदलने की बात उन्हीं सीटों को लेकर क्यों फैलाई जा रही है, जहां वरिष्ठ नेता जोशी या टंडन सांसद हैं।
अगर कोई बदलाव करना ही है तो उसके लिए पार्टी नेतृत्व ने समय रहते इन नेताओं की सहमति क्यों नहीं ली। तब प्रत्याशियों के चयन के समय यह झगड़ा सतह पर न आता।
टंडन कहते हैं, ‘राजनाथ सिंह ने अभी तक उनसे इस तरह की कोई बात नहीं की है। ऐसी खबरें जहां से भी उठ रही हैं उसके सूत्रधार मोदी की राह मुश्किल बनाने का षडयंत्र कर रहे हैं।’
इस बारे में डॉ. मुरली मनोहर जोशी से तो बातचीत नहीं हो पाई लेकिन टंडन जो कुछ कहते हैं, उससे यह बात साफ हो जाती है कि पार्टी को संवादहीनता, खींचतान व टांग खिंचाई से अभी निजात नहीं मिल पाई है।
जो भी हो, इस तरह के माहौल से पार्टी के तमाम वरिष्ठ नेता बहुत क्षुब्ध और नाराज हैं। इनका कहना है कि स्थिति किसी दूसरे ने नहीं बल्कि भाजपा के ही उन लोगों ने बनाई है, जिनकी अति महत्वाकांक्षा पहले भी पार्टी पर भारी पड़ती रही है।
ये लोग जिस तरह खुद और अपने लोगों को मोदी की लहर पर सवार कराके संसद पहुंचाने की साजिश में जुट गए हैं, उसके चलते ये संसद पहुंचे या नहीं लेकिन मोदी व भाजपा की राह की मुश्किलें जरूर बढ़ती जा रही हैं।
'किसी को लड़ना है तो मुझसे कहे'
लालजी टंडन कहते हैं, उनके रिटायर होने या संन्यास लेने की बातों में कोई सच्चाई नहीं है। वह चुनाव की तैयारी कर रहे हैं।
बकौल टंडन, वह लखनऊ में पार्षद से लेकर सांसद तक रहे। शहर के चप्पे-चप्पे से पूरी तरह वाकिफ हैं। लखनऊ की अलग पहचान है।
कहते हैं, ‘मैंने तो बहुत पहले घोषणा की थी कि मोदी अगर लखनऊ से लड़ना चाहते हैं तो उन्हें खुशी होगी। पर, अभी तक मुझसे न तो कोई ऐसी बात कही गई और न प्रस्ताव आया।
मोदी मुझसे सीधे भी कह सकते हैं। जहां तक राजनाथ सिंह जी की बात है तो उन्होंने भी अभी तक ऐसा कोई संकेत मुझे नहीं दिया है।
मुझे नहीं पता कि लखनऊ या ऐसी अन्य कुछ सीटों पर कुछ नेताओं के लड़ने या लड़ाने अथवा टिकट बदलने की चर्चाओं के पीछे कौन है? मगर जो भी हो इस तरह की खबरें व अफवाहें मोदी की मुश्किलें बढ़ाने वाली हैं।’
नेतृत्व की रीति-नीति से बढ़ी मुश्किलें
मोदी की हवा के बावजूद जिस तरह पार्टी नेतृत्व ने प्रत्याशियों की घोषणा को अटका रखा है, उससे भी समस्या बढ़ी है।
कार्यकर्ताओं के एक बड़े वर्ग में इसे लेकर नाराजगी बढ़ती जा रही है कि अच्छा माहौल बनते ही पार्टी का एक गुट और राष्ट्रीय नेतृत्व निष्ठावान कार्यकर्ताओं की अनदेखी कर अवसरवादियों को मौका देने में जुट गया है।
टंडन हालांकि बहुत साफ नहीं बोलते। पर, वह जो कुछ कहते हैं, उससे पता चल जाता है कि वह भी इस बात से आहत हैं कि उनसे बातचीत किए बगैर उनकी सीट बदलने की बात फैला दी गई।
पाल ने भी बढ़ाया बवाल
कांग्रेस से इस्तीफे के बाद जगदंबिका पाल ने जिस तरह नरेंद्र मोदी की तारीफ शुरू कर दी है, उससे भाजपा में उनके जाने की अटकलें तेज हो गई हैं। हालांकि जिस तेजी से अटकलें बढ़ी हैं, उसी तेजी से भगवा टोली के भीतर पाल का विरोध भी शुरू हो गया है।
बावजूद इसके भाजपा नेतृत्व पाल को पार्टी में लेना चाहता है। इस खेमे का तर्क है कि इससे उन्हें एक बड़ा चेहरा मिल जाएगा। साथ ही कांग्रेस में भगदड़ का संदेश जाने का लाभ मिलेगा।
दलबदलुओं को लेकर माहौल कुछ वैसा ही बनता जा रहा है जैसा 2012 के विधानसभा चुनाव के दौरान कुशवाहा से लेकर अवधेश वर्मा तक को गले लगाने के बाद बन गया था।
तब पार्टी नेतृत्व की ओर से कार्यकर्ताओं के विरोध की अनदेखी भाजपा पर भारी पड़ी थी। उम्मीदवारों की घोषणा के साथ भाजपा की मुसीबतें बढ़ती चली गईं।
जो उम्मीदवार घोषित हुए उनको लेकर विरोध इतना भड़का कि शायद ही कोई जिला अछूता रहा हो।
अंदर व बाहर वालों की लड़ाई के चलते मुख्यालय पर इतने धरना-प्रदर्शन हुए कि हर जिले में पार्टी के प्रत्याशियों को दूसरों से पहले अपने ही दल के लोगों से लड़ाई लड़नी पड़ी और भाजपा को चुनाव में मात खानी पड़ी।
प्रदेश व केंद्रीय नेतृत्व के बीच भी खींचतान
सूत्रों के अनुसार, पिछले दिनों दिल्ली में यूपी के कोर कमेटी के नेताओं की बैठक में भी पाल को पार्टी में लेकर उन्हें चुनाव लड़ाने पर आपत्ति उठाई गई। इनका तर्क है कि यह न हुआ होता तो अब तक पाल भाजपा में आ चुके होते।
यूपी के प्रमुख नेताओं ने जो आपत्तियां रखीं, उनमें अतीत में भाजपा की सरकार को डांवाडोल करने और पार्टी कार्यकर्ताओं के विरोध सहित उनके कामकाज करने के तरीके का जिक्र किया गया।
कल्याण सिंह भले ही सार्वजनिक रूप से इस मुद्दे पर बोलने से इन्कार कर रहे हों लेकिन उन्होंने भी नेतृत्व के सामने यह तर्क रख दिया है कि भाजपा सरकार गिराने वाले षड्यंत्रकारियों को पार्टी में लेने का संदेश ठीक नहीं जाएगा।