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नेहरू जी ने अटल को कहा था... भावी प्रधानमंत्री, पढ़ें उनसे जुड़ी रोचक बातें

Mon, 26 Dec 2016 06:57 PM IST
ब्यूरो/अमर उजाला, लखनऊ
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अटल बिहारी वाजपेई व जवाहर लाल नेहरू - फोटो : amar ujala
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पूर्व प्रधानमंत्री अटल बिहारी वाजपेई सार्वजनिक जीवन से दूर रहते हुए आज भी लोगों के दिलों में गहराई से समाए हुए हैं। उनके लखनऊ से लगाव व उनकी लोकप्रियता के बारे में बता रहे हैं राजनाथ सिंह 'सूर्य'। अटल बिहारी वाजपेयी पहली बार 1991 में लखनऊ से लोकसभा के लिए निर्वाचित हुए थे। हालांकि वे 1957 में ही बलरामपुर से निर्वाचित होकर लोकसभा के सदस्य बन चुके  थे।
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लखनऊ से चुनाव जीतने का महत्व इसलिए है क्योंकि वे 1954 में लोकसभा के लिए एक उपचुनाव में जनसंघ उम्मीदवार के रूप में पहली बार लखनऊ से ही मैदान में उतरे थे।

इसके बाद वे प्राय: सभी लोकसभा चुनाव में (1980 को छोड़कर जब भाजपा ने यह सीट जनता पार्टी के लिए समझौते में छोड़ दी थी) वे अन्य स्थानों के अलावा लखनऊ से भी उम्मीदवार हुआ करते थे।
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चाहे जनसंघ रहा हो, या फिर भाजपा, दोनों ही संगठनों के चुनाव अभियान में अटल ही आकर्षण के मुख्य केंद्र रहे। इन पार्टियों के उम्मीदवारों ने लखनऊ के मतदाताओं से वाजपेयी का वास्ता देकर ही वोट हासिल किए। आखिर ऐसा क्या था अटलजी में कि भाजपा या पूर्व के जनसंघ में यही अनुभूति बनी रही कि चुनावी नौका उनके नाम से ही पार लगाई जा सकती है।

‘हिन्दू तन-मन हिन्दू जीवन, रग रग हिन्दू मेरा परिचय’

अटल बिहारी वाजपेयी, जिन्हें लखनऊवासी सिर्फ अटलजी कहकर संबोधित करते हैं, लखनऊ के जनजीवन में स्वतंत्रता पूर्व से अभिन्न अंग बन गए थे। वे संघ के प्रचारक के रूप में 1942 में लखनऊ आए थे।

संघ प्रचारक के रूप में ही उन्होंने पं. दीनदयाल उपाध्याय के मार्गदर्शन में संघ की वैचारिक पत्रिका राष्ट्र धर्म का सम्पादन शुरू किया। उनकी साहित्यिक अभिरुचि ने उन्हें यहां के साहित्यकारों के संपर्क में आने का अवसर प्रदान किया।

वे राष्ट्रीय भावना से ओत-प्रोत वीर रस की कविताओं की न केवल रचना करते रहे, बल्कि कवि सम्मेलनों, पार्टी के कार्यक्रमों, यहां तक कि सार्वजनिक सभाओं में भी उसका पाठ करते रहे।

उनकी सबसे प्रसिद्ध कविता, जिसका विद्यार्थी जीवन में अंत्याक्षरी में पाठ कर मैंने भी पुरस्कार पाया है, ‘हिन्दू तन-मन हिन्दू जीवन, रग रग हिन्दू मेरा परिचय’ की एक पंक्ति भारतीयता या हिन्दुत्व को समझाने की सरलता का उदाहरण है।

वह पंक्ति है ‘कोई बताये कब हमने काबुल में जाकर मस्जिद तोड़ी, भूभाग नहीं शत-शत मानव के हृदय जीतने का निश्चय’। संघ प्रचारक के  रूप में युवावस्था में ही उन्होंने इन पंक्तियों से इतिहास को समझने का रास्ता दिखाया है।

अद्भुत था अटलजी की वाणी का प्रभाव

भारतवासी विदेशों में अपनी अवधारणा का प्रचार करने न तो तलवार लेकर गए और न ही तराजू। जिस मानवीयता का धर्म के रूप में हमारे ऋषियों ने निरूपण किया है, उसे जहां भी गए उनकी संस्कृति और परम्पराओं के साथ सामंजस्य स्थापित कर दिया। अटलजी का जीवन भी इसी सांमजस्य का स्वरूप रहा है।

यही कारण है कि चाहे उनके प्रति अनुराग रखने वाले लोग हों या राजनीतिक विरोधी, दोनों के बीच उनकी समान रूप से पैठ और प्रतिष्ठा थी। प्रसिद्ध साहित्यकार स्व. श्रीनारायण चतुर्वेदी ने उन्हें अजात् शत्रु की संज्ञा प्रदान किया था।

जनसंघ के संस्थापक अध्यक्ष डॉ. श्यामा प्रसाद मुखर्जी के निजी सहयोगी के रूप में राजनीति में आने से पहले ही उनकी पहचान बन चुकी थी। उन्होंने अपनी ओजस्वी वाणी और अभिव्यक्ति से लोगों को कितना प्रभावित किया था, इसका एक उदाहरण लोकसभा का है, जब आज के तमिलनाडु से उत्तर भारत विशेषकर हिन्दी भाषा के विरोध में जबदस्त आक्रोश छाया हुआ था।

तब संभवत: 1958 में लोकसभा में द्रविड़ मुनेत्र कड़गम के नेता ने कहा कि यदि आप वह हिंदी हम पर लादना चाहते हैं जो प्रधानमंत्री जवाहर लाल नेहरू बोलते हैं तो हमें स्वीकार नहीं है। यदि आप उस हिंदी को बढ़ाते हैं जो अटल बिहारी वाजपेयी बोलते हैं, तो हमें कोई आपत्ति नहीं है। अटलजी की वाणी का जो प्रभाव रहा है, आज तक उसका स्थान कोई दूसरा नहीं ले सका है।

'1991 में अटलजी के खिलाफ खड़ा किया राजबब्बर को'

लखनऊ की गलियों पैदल व साइकिल से घूमने वाले वाजपेयी के सामने 1991 के चुनाव में जिसे एक उद्योग घराने ने अभिनेता राजबब्बर को खड़ा किया था, उसी ने अगले निर्वाचन के बाद हवाई जहाज से उन पर फूलों की वर्षा भी करवाई।

अटलजी के साथ जिन लोगों ने काम किया था, बजरंगशरण तिवारी, राधेश्याम रस्तोगी, कृष्णगोपाल कलंत्री आदि उनमें से कोई भी इस संसार में नहीं रहा।

अपने कठोर स्वभाव और कठिन जीवन साधना करते रहने वाले वचनेश त्रिपाठी भी जब अटलजी का उल्लेख करते थे तो उनकी आंखों में एक अजब सी चमक उभर आती थी।

राजीव लोचन अग्निहोत्री के राष्ट्रधर्म और बाद में दैनिक स्वदेश का संपादन सहयोग करने वालों में जो लोग रहे हैं, उनके अनुसार अटलजी शुरू से ही ‘पुरानी नींव नया निर्माण’ के प्रतीक रहे। अपनी सोच को उन्होंने व्यावहारिक स्वरूप भी प्रदान किया। यही उनकी स्वीकार्यता का सबसे बड़ा कारण बना।

'कांग्रेस के लिए अटलजी सदैव विश्वसनीय व्यक्ति रहे'

अट‌ल बिहारी वाजपेई - फोटो : amar ujala
राजनीतिक क्षेत्र में वैसे तो अटलजी के नेतृत्व वाली भाजपा कांग्रेस की प्रबल विरोधी रही है, लेकिन उनके नेताओं के लिए अटलजी सदैव विश्वसनीय व्यक्ति रहे हैं।

लोकसभा में एक भाषण के बाद जहां पं. जवाहरलाल नेहरू ने उनकी पीठ थपथपाते हुए भारत का भावी पीएम तक कह दिया दिया था, वहीं नरसिंह राव ने संयुक्त राष्ट्र संघ से लेकर मुस्लिम देशों के सम्मेलन तक में अटलजी को ही भारत का पक्ष रखने की कमान सौंपी।

मैंने उनका अंतिम भाषण 2003 में उस समय सुना था, जब वे पीएम भी थे। लखनऊ में भाजपा की राष्ट्रीय परिषद का दो दिवसीय सम्मेलन था। दीन दयाल उपाध्याय के बाद से अटलजी ही पाथेय के रूप में अन्तिम भाषण देते रहे हैं। इसलिए उस सम्मेलन में लोग बड़ी व्यग्रता से अटलजी को सुनने का इंतजार कर रहे थे।
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लखनऊ था उनके विश्राम का प्रिय नगर

अटलजी ने न तो अपने भाषण में राजनीति का उल्लेख किया और न ही अपने दायित्व निर्वहन का हिसाब-किताब दिया। उन्होंने विस्तार से बताया कि वे पहली बार लखनऊ अपने पिताजी के साथ आए थे। तब और अब के लखनऊ में कितना बदलाव आ गया है।

गोमती नदी के प्रदूषण पर उन्होंने गहरी चिन्ता व्यक्त करते हुए स्वच्छ, सुघड़ और परंपरा की ख्याति के अनुरूप स्वरूप प्रदान करने की आवश्यकता पर बल दिया था। वे कई वर्षों से अस्वस्थ हैं और दिल्ली में ही रह रहे हैं।

लखनऊ के सिकन्दरबाग के मुहाने पर लिखा है, ‘हम फिदाये लखनऊ और लखनऊ हम पर फिदा’। अटल जी का लखनऊ से इस उक्ति के अनुरूप ही लगाव था। मैं 1963 से लखनऊ में हूं। मैंने कई बार उन्हें रिक्शे पर अकेले बैठकर जाते हुए देखा।

राजनीतिक हलचल में विश्राम के लिए लखनऊ उनका प्रिय नगर रहा है। यहां ऐसे अनेक परिवार हैं, जहां वे बिना औपचारिकता के पहुंच जाया करते थे। उनके जन्मदिन पर हम उनके स्वस्थ होने और नई पीढ़ी, जिसके लिए वे हीरो रहे हैं, को आशीर्वाद मिलते रहने की कामना करते हैं।
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