स्वतंत्रता संग्राम आंदोलन से जुड़े मोहम्मद साबिर उर्फ मुतरिब निजामी हाल ही में राष्ट्रपति के हाथों सम्मानित होकर लौटे हैं। 15 फरवरी 1922 को पैदा हुए मुतरिब निजामी साहब फरमाते हैं कि हिंदुस्तान की आजादी के दिन राजधानी में गजब का मंजर था।
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उस दिन को याद कर आज भी उनकी बूढ़ी आखें खुशी से चमक उठीं और उम्र के इस पड़ाव पर भी वह बच्चे की तरह चहकने लगे। वह बोले अमीनाबाद के झंडे वाले पार्क में लोगों का जो हुजूम उमड़ा उसे देखकर लगता था जनसैलाब आ गया। उस वक्त झंडे वाला पार्क अमीनुद्ददौला के नाम से जाना जाता था।
पूरा पार्क जोश में सराबोर लोगों से पटा था। तिल रखने तक की गुंजाइश नहीं थी। उस दौर में रात में रोशनी का इंतजाम बहुत कम था और रात नौ बजे ही शहर में घना अंधेरा हो जाता था। लेकिन आजादी के दिन हालात बिल्कुल अलहदा थे।
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पार्क रोशनी से ऐसा जगमगा रहा था जैसे चांद अपनी ड्यूटी सूरज को देकर कहीं चला गया हो। छोटे बच्चे जिन्हें आजादी का मतलब नहीं मालूम वे भी जोश-ओ-खरोश से भरे थे।
ऐसा था लोगों में उत्साह
- फोटो : amar ujala
बच्चे तो बच्चे, बूढ़ों का उत्साह भी हिलोरे मार रहा था। त्योहार का माहौल था सभी नये कपड़ों में सजे धजे थे। ज्यादातर औरतों ने तिरंगे बॉर्डर की साड़ी पहन रखी थी जबकि पुरुष शबनम के कुर्ता-पायजामा के साथ खद्दर की टोपी में नजर आ रहे थे।
उसी पार्क के सामने मौजूदा गाढ़ा भंडार (जो आज भी मौजूद है) के ऊपर भारत माता की तस्वीर लगी थी। जिसके चारों ओर जलने-बुझने वाली बत्तियां लगी थीं जो सभी के लिए कौतूहल का विषय थीं। लोग एकटक उसे निहार रहे थे।
पूरा अमीनाबाद भड़ से भरा था इसके बावजूद न तो कोई सिपाही था और न ही स्वयं सेवक फिर भी सभी कुछ सुरक्षित और व्यवस्थित। ऐसा भाईचारा दिखाई दे रहा था जिसे शब्दों में बयां नहीं किया जा सकता है। कोई किसी से बदतमीजी तो क्या तेज आवाज में भी बात नहीं कर रहा था।
पार्क के गेट पर थाली में लड्डू रखे थे जो वहां आने वाले सभी लोगों को बांटे जा रहे थे। कोई रोक टोक नहीं थी जिसका जितना जी चाहे लड्डू खाए।
अजब था माहौल
- फोटो : amar ujala
आज जहां जगत सिनेता हाल है वहां उन दिनों 'सुंदर' हाल हुआ करता था। आज भी आंखें बंद करने पर वहां लगा 'रतन' फिल्म का पोस्टर आंखों के सामने आ जाता है। वहां भी कई लोग मिठाई बांट रहे थे। रात दस बजे तक तो पार्क में पांव रखने की भी जगह नहीं थी।
पार्क के किनारे एक मंच बना था। जिस पर लोग तकरीर कर रहे थे 'देश हमारा धरती अपनी, हम धरती के लाल। नया भारत बनाएंगे नया संसार बनाएंगे। भारत को भारत बनाएंगे।' या फिर वंदे मातरम् भी गूंज रहा था। बच्चों के लिए तो यह दिन किसी मेले सरीखा था।
पार्क के चारों ओर खोमचे लगे थे, कई खोमचे वाले बच्चों को मुफ्त में भी समान खिलाकर अपनी खुशी का इजहार कर रहे थे। सबसे ज्यादा भीड़ आईसक्रीम व बर्फ के गोले बेचने वालों के पास थी। कई लोग बच्चों को आईसक्रीम व गोलों की दावत दे रहे थे। हेलीकॉप्टर से लोगों पर फूलों की बारिश की जा रही थी।
कुछ उत्साही नौजवान पटाखे फोड़ रहे थे तो कुछ एक-दूसरे को अबीर-गुलाल लगा रहे थे। इस बीच किसी ने मंच पर खबर दी कि कुछ लोग विक्टोरिया स्ट्रीट पर मौजूद 'अफजल महल' में नवाब वाजिद अली शाह के खानदान से ताल्लुक रखने वाले प्रिंस यूसुफ की ताजपोशी कर रहे हैं।
खैर, जैसे ही रात के बारह बजे अंग्रेजी झंडा उतारा गया और तिरंगा लहराया लोगों का जोश चरम पर पहुंच गया। नारों का जोश और आवाज ऐसी थी कि जैसे देवता आकाशवाणी कर रहे हों।
चौराहों पर बंटी जलेबी और बर्फी
डॉ. बैजनाथ सिंह, स्वतंत्रता सेनानी
- फोटो : amar ujala
स्वतंत्रता संग्राम सेनानी डॉ. बैजनाथ सिंह का जन्म 7 जून 1919 को हुआ। उम्र के इस पड़ाव में भी उनकी चुस्ती-फुर्ती युवाओं को मात देती है। बात जब देश की आजादी और महात्मा गांधी की निकली तब तो वे एक बच्चे की मानिंद चहकने लगे।
बताते हैं कि जौनपुर के शाहगंज तहसील में मदरहा कस्बे में राजा हरपाल सिंह हाईस्कूल सिगरामऊ में शिक्षा ग्रहण करने के दौरान ही जंग-ए-आजादी का चस्का चढ़ गया था। अफसोस के साथ कहते हैं कि मगर पहली बार जेल जाने का सुख सन् 1942 में मिला।
बात जब 15 अगस्त 1947 की निकली तब तो बैजनाथ का उत्साह चरम पर था। बोले, वह सुबह कितनी सुहानी रही होगी इसका अंदाज आप इसी से लगा सकते हैं कि उसका जिक्र आते ही मेरे रोंगटे खड़े हो जाते हैं।
आज की पीढ़ी तो इसका अंदाजा भी नहीं लगा सकती। लखनऊ में भी आजादी की नई सुबह का इस्तकबाल किया। देश की आजादी के लिए अपने प्राणों की आहुति देने वाले बलिदानियों के सम्मान में सभी की आंखें नम थीं।
आजादी की पहली सुबह राज्यपाल सरोजनी नायडू लखनऊ मेल से राजधानी पहुंची। उनके स्वागत के लिए स्टेशन पर इतने लोग जमा थे कि उन्हें वहां से निकलने तमाम मुश्किल पेश आईं। वहां से वह सीधे राजभवन पहुंचीं। जहां उन्होंने झंडा फहराया। इस दौरान सभी लोग अपने-अपने घरों से बाहर आकर खुशियां मना रहे थे।
आजादी का पहली बार स्वाद चखने का उत्साह सभी के चेहरे पर साफ दिखाई दे रहा था। हजरतगंज के आसपास का इलाका इस जश्न का केंद्र बिंदु था। शहर के अलग-अलग इलाकों से आने वाली लोगों की टोलियां ढोल और नगाड़े साथ लेकर चल रही थी। पूरा लखनऊ खुशी से झूम रहा था।
उस वक्त मिठाई की दुकान में सबसे फेवरेट आइटम जलेबी और दूध की बर्फी हुआ करती थी। दुकानदार मारे खुशी के उसे मुफ्त ही बांट रहे थे। उसे लेने के लिए कहीं भी कोई लड़ाई झगड़ा नहीं.. लोग बारी बारी से लेकर खुशियां मना रहे थे।
हां एक बात और जो खास थी वह यह कि उस दिन अखबार को लेकर लोगों में बहुत कौतूहल था, जिसके हाथ में अखबार दिखता लोग उसे पढ़ने लगते।