बच्चे की कस्टडी को लेकर मां और पिता के अधिकार समान हैं। मां के पास भी वही अधिकार हैं जो किसी पिता का अपने बच्चे पर हो सकते हैं। अदालत किसी एक के अधिकार को स्वीकार नहीं कर सकती।
पति से अलग हो चुकी महिला से बच्चों की कस्टडी मांगने के लिए एक पति की बंदी प्रत्यक्षीकरण याचिका खारिज करते हुए हाईकोर्ट की लखनऊ खंडपीठ ने सोमवार को यह बात कही।
कोर्ट में याचिका दायर कर पति असलम खान ने कहा था कि आरजू बेगम से 1993 में उसकी शादी हुई थी। उसे चार बेटियां हुईं जिनमें दो बालिग हैं। छोटी बेटियों की उम्र नौ व आठ वर्ष है।
आरजू को उसकी बहन और कुछ रिश्तेदार बहलाकर अपने साथ ले गए हैं। वे उसे विशेष तरह की इबादत करवाके बेटा पैदा होने का लालच दे रहे हैं। आरजू अपने साथ दोनों छोटी बेटियों के अलावा कैश व जेवर भी ले गई है।
इसकी शिकायत जुलाई 2015 में बहराइच के महिला थाने व डीएम से की गई, लेकिन कोई कार्रवाई नहीं हुई। ऐसे में उसने अदालत से अपनी पत्नी को छुड़ाने व बेटियों की कस्टडी दिलाने की प्रार्थना की थी।
दूसरी ओर असलम की पत्नी ने 19 अगस्त 2015 को कोर्ट में पेश होकर बताया कि वह अपने पति के साथ नहीं रहना चाहती क्योंकि वह खराब व्यवहार करता है। वह किराए के मकान में रह रही है। आरजू ने दोनों छोटी बेटियों को भी अदालत में प्रस्तुत किया।
कोर्ट ने असलम को बेटियों के खर्च के लिए 25 हजार रुपये जमा कराने के आदेश दिए, जो उसने जमा करवाए। वहीं, आरजू बेगम ने अदालत को बताया कि उसकी 48 वर्षीय बहन और असलम के बीच अवैध संबंध हैं।
बहन उनके साथ ही रहती है। असलम ने उसका नाम राशन कार्ड में अपनी पत्नी के तौर पर लिखवा दिया है, जबकि दोनों ने निकाह तक नहीं किया है।