अब भारतीय विष विज्ञान संस्थान (आईआईटीआर) पानी में न्यूरोमैटेरियल्स की टॉक्सिसिटी की जांच करेगा। आईआईटीआर प्रबंधन के मुताबिक, न्यूरोमैटेरियल्स का उपयोग इंडस्ट्रीज के साथ उपयोगी वस्तुओं में तेजी से बढ़ा है।
साथ ही बायो-सिक्योरिटी के चलते टॉक्सिसिटी के निर्धारण की चुनौती भी खड़ी हो गई है। न्यूरोमैटेरियल्स की वजह से फैल रहे जहर और उसको पहचानने के लिए प्रभावी तकनीक विकसित करने पर भी काम करने की जरूरत है।
संस्थान ने इस पर काम शुरू कर दिया है। इसकी मदद से न्यूरोमैटेरियल्स के कारण पैदा हो रहे खतरे और समाधान की जानकारी दी जा सकेगी। संस्थान के निदेशक डॉ. केसी गुप्ता ने बताया कि न्यूरोमैटेरियल्स पर हम काम कर रहे हैं।
साथ ही खाद्य पदार्थ में मिलावट को गंभीरता से लिया गया है। अब इस कड़ी में हम पानी की टॉक्सिसिटी की जांच भी करने की योजना बना रहे हैं। संस्थान के वैज्ञानिकों को इसके लिए निर्देश दिए जा चुके हैं।
इससे पता चल सकेगा कि जो पानी हम पी रहे हैं। वह कितना सुरक्षित है। पानी की सुरक्षा को लेकर आईआईटीआर उड़ीसा में आए साइक्लोन के दौरान काम कर चुका है।
उसी समय संस्थान ने बैक्टो-ओ-किल नाम की तकनीक विकसित की थी। इस उपलब्धि को संस्थान एक नए आयाम पर ले जाने की कोशिश में है।
ये हैं न्यूरोमैटेरियल्स
वह सूक्ष्मतम कण जो आकार में एक माइक्रोमीटर के दसवें हिस्से से भी छोटे होते हैं। इन पार्टिकल की मदद से हल्के और छोटे आकार के उत्पाद जैसे पॉलीमर और मेटल बनाए जा सकते हैं।
इन पार्टिकल का इस्तेमाल गंभीर मरीजों के लिए नई ड्रग, कैंसर थेरेपी में किया जा सकता है। इसके हेल्थ रिस्क होने की भी बात वैज्ञानिक भी कहते हैं।