मुख्यमंत्री के रूप में अखिलेश यादव एक प्राइमरी स्कूल में गए। अन्य सवालों के साथ ही उन्होंने बच्चों से पूछा कि प्रदेश का मुख्यमंत्री कौन है? छात्रों ने कहा, राहुल गांधी। एक अन्य कार्यक्रम में महिला लाभार्थी से पूछा कि समाजवादी पेंशन किसने दी है, तो वह इसका उत्तर नहीं दे पाई।
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जिस प्रदेश में जागरूकता का स्तर इतना कम हो, वहां सिम्बल छिन जाने का क्या असर होगा, इसका अंदाजा आसानी से लगाया जा सकता है। जाहिर है, साइकिल चुनाव चिह्न जब्त हुआ तो सपा के दोनों ही खेमों को घाटा उठाना पड़ेगा।
सपा के सिम्बल को लेकर एक पखवाड़े से मुलायम और अखिलेश खेमे में जंग चल रही है। एक जनवरी को अखिलेश खेमे ने लखनऊ में सपा का विशेष राष्ट्रीय अधिवेशन किया तो मुलायम सिंह यादव ने इसकी वैधता को चुनौती दी और उसी दिन निर्वाचन आयोग को फैक्स व मेल से पत्र भेज दिया।
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अगले दिन दोनों ही खेमे आयोग पहुंच गए। तभी से कानूनी लड़ाई चल रही है कि असली समाजवादी पार्टी कौन सी है। मुलायम सिंह की या अखिलेश की। आयोग ने फैसला रिजर्व कर लिया है। आयोग जिसे असली सपा मानेगा, उसे साइकिल सिम्बल मिल जाएगा।
सिम्बल सीज हुए तो होगा ये...
अखिलेश यादव
- फोटो : amar ujala
यदि इतनी जल्दी विवाद न सुलझा तो चुनाव आयोग ‘साइकिल’ जब्त कर लेगा। दोनों ही पक्षों को अलग-अलग नाम से राज्य स्तर पर मान्यता प्राप्त दल का दर्जा देकर नए चुनाव चिह्न आवंटित कर दिए जाएंगे।
सिम्बल सीज होने की स्थिति में सपा को राजनीतिक तौर पर घाटा उठाना पड़ेगा। साइकिल को समाजवादी नेता 25 साल से चला रहे थे। एकाएक उससे उतरकर किसी दूसरे निशान से चुनाव में जाने से वोटर गुमराह होंगे।
दोनों ही खेमों के लिए नए सिम्बल को पॉपुलर बनाना आसान नहीं होगा। खासतौर से तब, जब बिना किसी देरी केचुनाव मैदान में उतरना है। 17 जनवरी से पहले चरण के चुनाव के लिए 15 जिलों मेंनामांकन प्रारंभ होने जा रहे हैं। अभी तक सपा का प्रचार साइकिल के इर्द-गिर्द सीमित था।
सपा के गीतों में साइकिल का जिक्र है तो बैनर, पोस्टर, झंडे उसके बिना नहीं बने। आचार संहिता लगने से पहले तक हर सपा नेता की गाड़ी पर साइकिल वाला सपा का झंडा लगा दिखाई देता था। गाड़ियों के पीछे लगे पोस्टरों के नारों पर भी साइकिल बनी होती थी। साइकिल को पॉपुलर बनाने के लिए प्रदेश सरकार ने भी कई लाभकारी योजनाएं चलाईं।
श्रम विभाग ने बांटी 8 लाख साइकिलें
अखिलेश यादव
प्रदेश सरकार का श्रम विभाग मजदूरों को अब तक 8 लाख साइकिल बांट चुका है। मुख्यमंत्री के निर्देश पर श्रम मंत्री शाहिद मंजूर ने अन्य योजनाओं के साथ ही साइकिल वितरण को खास तवज्जो दी। कुल 10 लाख 40 हजार 476 साइकिलें बांटने का लक्ष्य तय किया गया था। पिछले महीने तक तक 7,93,542 साइकिलें बंट चुकी थीं।
आचार संहिता लगने से पहले तक आठ लाख से ज्यादा साइकिलें बांट दी गईं। इस योजना पर सरकार ने 230 करोड़ रुपये खर्च किए। खुद शाहिद मंजूर ने 34 जिलों में जाकर साइकिल वितरण किया।
मुख्यमंत्री अखिलेश के अधिकतर कार्यक्रमों में उनके हाथों से भी साइकिल बंटवाई गईं है। साइकिल बांटने की योजना प्रारंभ करते समय सरकार की मंशा मजदूरों का राहत पहुंचाने के साथ ही सपा के सिम्बल को लोकप्रिय बनाना भी था।
साइकिल ट्रैक का निर्माण सरकार की प्राथमिकताओं में रहा। इसे जहां एनवॉयरमेंट फ्रैंडली कदम बताया गया, वहीं इसे बनवाने की एक वजह साइकिल की ब्रांडिंग थी। सपा ने इटावा से लॉयन सफारी के बीच देश का सबसे बड़ा साइकिल हाई-वे का निर्माण कराया था। इस पर इंटरनेशनल साइकिल राइडिंग कॉम्पीटिशन हो चुका है। लखनऊ में भी साइकिल ट्रैक बनाने और उसके प्रचार पर भी पूरा जोर दिया।
वर्ष 2012 के चुनाव से पहले अखिलेश यादव समेत सपा के तमाम मंत्री, विधायक और नेता साइकिल चलाते रहे हैं। पिछले साल भी सरकारी योजनाओं के प्रचार-प्रसार केलिए सप्ताह भर तक साइकिल यात्राएं निकाली गईं थी।
मुलायम सिंह, शिवपाल यादव भी कई बार साइकिल चला चुके हैं। सीएम बनने के बाद भी अखिलेश यादव ने फिरोजाबाद से आगरा रोड पर साइकिल चलाई थी।
सपा की साइकिल यात्राओं का मकसद लोगों तक अपनी बात पहुंचाने के साथ ही अपने सिम्बल की लोकप्रियता बढ़ाना था। सीएम अक्सर कहते हैं कि 2012 में हमने साइकिल चलाकर सरकार बनाई थी।