बहुजन समाज पार्टी की राष्ट्रीय अध्यक्ष मायावती
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बसपा सुप्रीमो मायावती ने सपा से लोकसभा चुनाव में गठबंधन और गेस्ट हाउस कांड का मुकदमा वापस लेने को बड़ी गलती बताते हुए कहा कि चुनाव बाद कई बार अखिलेश यादव को फोन किया, लेकिन उन्होंने जवाब नहीं दिया। इसके बाद मजबूरी में सपा से अलग चलने का फैसला करना पड़ा। बसपा ने संकीर्ण ताकतों को सत्ता से दूर रखने के लिए गेस्टहाउस कांड जैसी न भुलाने वाली घटना को भी भुलाते हुए सपा से लोकसभा चुनाव में गठबंधन किया था, लेकिन परिवार की लड़ाई में अखिलेश को इस गठबंधन का ज्यादा फायदा नहीं मिल सका।
मायावती ने कहा कि सतीश चंद्र मिश्र प्रतिष्ठित अधिवक्ता हैं और उन्हें राजनीति का अच्छा तजुर्बा है। ऐसे में अखिलेश का उनसे बात न करना पूरे प्रदेश के ब्राह्मण समाज का अपमान है। यूपी का ब्राह्मण सपा से इस अपमान का बदला आगामी विधानसभा चुनाव में जरूर लेगा। उन्होंने कहा कि सपा राज में आए दिन हत्या होती थी। गुंडों-बदमाशों का राज था। ब्राह्मण व दलितों को कुछ समझा ही नहीं जाता था। ऐसे में कानून-व्यवस्था को लेकर भाजपा सरकार को नसीहत देने का सपा को कोई अधिकार नहीं है। बसपा सरकार ने प्रदेश को बेहतर कानून-व्यवस्था का माहौल दिया। ऐसे में प्रदेश की कानून-व्यवस्था न संभाल पाने के लिए भाजपा सरकार को नसीहत देने का अधिकार बसपा को है। उनकी सलाह को लोग मानेंगे।
हम तो डिंपल को राज्यसभा पहुंचाना चाहते थे
मायावती ने कहा कि वह सोचती थी कि अखिलेश यादव राज्यसभा चुनाव में प्रो. राम गोपाल यादव के अलावा दूसरा प्रत्याशी अपनी पत्नी डिंपल यादव को बनाएंगे। वह कन्नौज का चुनाव हार गई थीं। मैंने तय कर लिया था कि यदि डिंपल को प्रत्याशी बनाया जाता है तो बसपा अपना प्रत्याशी न खड़ाकर उन्हें जिताएगी। लेकिन अखिलेश ने फोन ही नहीं उठाया।
रामगोपाल से बात के बाद उतारा बसपा प्रत्याशी
मायावती ने कहा कि राज्यसभा चुनाव की अधिसूचना जारी होने के बाद बसपा महासचिव सतीश ने अखिलेश को फोन किया। उनका फोन नहीं उठा। बाद में अखिलेश के पीएस को फोन किया। पीएस ने कहा कि बात करा देंगे, पर नहीं कराई। इसके बाद सतीश ने सपा महासचिव रामगोपाल से बात की। उनसे पूछा कि सपा कितने प्रत्याशी उतारेगी? राम गोपाल ने एक ही प्रत्याशी उतारने की बात कही। इस पर सतीश ने उन्हें बताया कि यदि सपा एक ही प्रत्याशी उतार रही है तो एक प्रत्याशी बसपा उतारेगी। आखिरी सीट के लिए सभी विरोधी पार्टियों के वोट भाजपा से अधिक हैं। लेकिन अखिलेश ने अपने पिता की तरह दलित विरोधी कार्य किया। निर्दलीय का पर्चा भरवाकर बसपा के प्रस्तावक विधायकों की खरीद-फरोख्त कर बसपा प्रत्याशी का पर्चा खारिज कराने की कोशिश की। लेकिन वे इस षड्यंत्र में नाकाम रहे।