राष्ट्रीय मानवाधिकार आयोग (एनएचआरसी) ने मुजफ्फरनगर दंगा पीड़ितों के शिविरों में बदइंतजामी पर अफसरों को जमकर लताड़ लगाई।
मानवाधिकार मामलों की सुनवाई के अंतिम दिन शुक्रवार को आयोग ने मुजफ्फरनगर में महिलाओं के प्रति हुए अपराधों के मामलों में कार्रवाई न होने और मृतकों के परिवार वालों को पर्याप्त आर्थिक मदद न दिए जाने पर नाराजगी जताई।
आयोग के सदस्यों ने कहा कि हमारी टीम ने तीन बार दंगा प्रभावित क्षेत्र व राहत शिविरों का दौरा किया।
जब सात लोगों की मौत हो चुकी थी, तब शिविर में मौजूद मुख्य चिकित्सा अधिकारी जैसे जिम्मेदार लोग आयोग की टीम को बरगलाने की कोशिश रहे थे।
शिविर में चिकित्सीय व अन्य सुविधाएं मानक के अनुरूप नहीं थीं। बच्चों व अन्य लोगों को निमोनिया से लेकर अलग-अलग बीमारियां थीं, लेकिन इलाज के नाम पर पैरासेटामॉल जैसी दवाएं ही मौजूद थीं।
आयोग के पूछने पर अधिकारियों ने बताया कि हत्या के मामले में कुल 101 लोगों को गिरफ्तार किया गया जबकि महिलाओं के साथ दुराचार व हिंसा के 13 मामलों में 111 लोगों के नामजद होने के बाद भी अभी तक किसी की गिरफ्तारी नहीं हो सकी है।
कुंभ के बहाने दिखाया आईना
न्यायमूर्ति सत्यब्रत पाल ने कहा, यह बड़े आश्चर्य की बात है कि जिस उत्तर प्रदेश में विश्व के सबसे बड़े आयोजनों में से एक प्रयाग महाकुंभ सफलतापूर्वक आयोजित कराया जाता है,
वहां चंद हजार लोगों को राहत देने के लिए लगाए शिविरों में आधी-अधूरी तैयारी रही।
जहां कुंभ में सरकार की तैयारियां साफ दिखीं, वहीं मुजफ्फरनगर में पुराने और कमजोर कपड़ों के तंबू लगाए गए। इसके अलावा इलाज समेत अन्य सुविधाओं का अभाव साफ दिखा।