कई महीनों से समाजवादी पार्टी में जारी बवाल और विवादों को चुनाव आयोग ने दो विभाजनकारी घटकों का उदय मानते हुए अंतिम निर्णय सुनाया। इसमें सबसे महत्वपूर्ण साबित हुआ एक जनवरी को जनेश्वर मिश्रा पार्क में आयोजित सपा के विशेष राष्ट्रीय अधिवेशन में सांसदों, विधायकों, पार्टी के पदाधिकारियों और विभिन्न विंग के सदस्यों की भारी मौजूदगी।
आयोग ने इसे ‘बहुमत के परीक्षण’ के तौर पर स्वीकार किया और अखिलेश के पक्ष में फैसला सुनाते हुए समाजवादी पार्टी का नाम और निशान साइकिल दोनों ही उन्हें दे दिए। इस मामले में दोनों पक्षों ने क्या तर्क दिए और आयोग ने उनका किन आधारों पर विश्लेषण कर अपना निर्णय दिया, इस पर खास रिपोर्ट:
दो प्रमुख मुद्दे जिन पर आयोग को निर्णय करना था
मुद्दा एक : क्या आयोग संतुष्ट है कि ‘निर्वाचन प्रतीक (आरक्षण एवं आवंटन) आदेश’ के पैरा 15 के तहत समाजवादी पार्टी में टूट हो चुकी है जिसकी वजह से पार्टी के भीतर ही दो परस्पर विरोधी घटक बन गए हैं? एक घटक जिसका नेतृत्व अखिलेश यादव और रामगोपाल यादव कर रहे हैं और दूसरा घटक जिसे मुलायम सिंह यादव का नेतृत्व प्राप्त है।
आयोग को यह करना था
पैरा 15 के अनुसार अगर अपने पास आई सूचनाओं के अनुसार आयोग संतुष्ट हो जाता है कि किसी राजनीतिक दल में परस्पर विरोधी घटक या समूह बन गए हैं और वे सभी दल होने का दावा करने लगे हैं तो ऐसे में आयोग सभी तथ्यों और परिस्थितियों को ध्यान में रखते हुए और हर उस समूह का पक्ष सुनते हुए तय करेगा कि कौन-सा घटक मान्यता प्राप्त राजनीतिक दल है या फिर कोई भी नहीं है। आयोग का यह निर्णय सभी के लिए बाध्यकारी होगा।
अखिलेश की ओर से कपिल सिब्बल ने ये दिए तर्क
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अखिलेश यादव पक्ष की ओर से अधिवक्ता कपिल सिब्बल का कहना था कि सपा दो घटकों में बंट चुकी है और आयोग को ही पैरा 15 के अनुसार इस पर निर्णय करना है।
सिब्बल ने इसके समर्थन में आयोग का चार जनवरी 2017 का मुलायम सिंह यादव व रामगोपाल यादव को संबोधित पत्र रखा, जिसमें आयोग ने दोनों पक्षों को नौ जनवरी तक अपना जवाब दाखिल करने के लिए कहा था। उन्होंने कहा कि आयोग ने खुद इस बात का उल्लेख किया है, इस पर और विवाद नहीं हो सकता।
- सिब्बल ने खुद मुलायम सिंह यादव द्वारा 30 दिसंबर 2016, 1 जनवरी 2017 और 2 जनवरी 2017 को आयोग को संबोधित पत्रों को भी अपना आधार बनाया। 30 दिसंबर के पत्र में बताया गया है कि रामगोपाल यादव को पार्टी विरोधी गतिविधियों के लिए 30 दिसंबर को पार्टी से निकाल दिया गया है, इसलिए आयोग सपा पदाधिकारी के तौर पर उनसे कोई संवाद न करे।
एक और दो जनवरी को मुलायम सिंह ने खुद कहा कि रामगोपाल द्वारा एक जनवरी को लखनऊ में बुलाए गए सपा के राष्ट्रीय अधिवेशन और उसमें पास हुए प्रस्तावों को आयोग न माने। इस अधिवेशन को सपा के केंद्रीय संसदीय बोर्ड ने असंवैधानिक करार दिया है और इसे ऐसे व्यक्ति ने बुलाया है जो खुद पार्टी से बाहर है। बोर्ड ने इसमें पास प्रस्तावों को भी रद्द कर दिया है।
- सिब्बल ने दावा किया कि मुलायम सिंह ने जिस अधिवेशन को असंवैधानिक बताया, उसमें पार्टी के बहुसंख्य सदस्य शामिल थे। पार्टी के टिकट पर संसद और विधानसभा में चुने गए 90 प्रतिशत सदस्य भी शामिल थे।
मुलायम सिंह कहते रहे, नहीं टूटी है समाजवादी पार्टी
मुलायम सिंह यादव
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- मुलायम सिंह की ओर से अधिवक्ता मोहन पारासरन ने आयोग से कहा कि पार्टी में कोई टूट नहीं है। इसके समर्थन में उन्होंने तर्क दिया कि मुलायम सिंह समाजवादी पार्टी में ही हैं। अखिलेश समूह का दावा है कि एक जनवरी 2017 को अधिवेशन में अखिलेश को पार्टी अध्यक्ष चुना गया है, ऐसे में आयोग को तो यह तय करना है कि अखिलेश को अध्यक्ष बनाया जाना पार्टी के संविधान के अनुसार सही था या नहीं। पार्टी के अंदरूनी प्रबंधन में कोई विवाद पैदा हो रहा है तो इसका मतलब यह नहीं कि पैरा 15 के अनुसार पार्टी में दो घटक मान लिए जाएं।
- तीन जनवरी को आयोग को दिए प्रार्थना पत्र में रामगोपाल ने कहा है कि अखिलेश यादव को अभी राष्ट्रीय अध्यक्ष के तौर पर मान्यता पाना बाकी है। उस पत्र में ऐसा कहीं नहीं लिखा कि अखिलेश यादव किसी विरोधी घटक के नेता हैं और पार्टी पर अपना दावा कर रहे हैं।
- दूसरी ओर मुलायम ने अपने पत्र में आयोग को साफ किया था एक जनवरी को हुआ अधिवेशन असंवैधानिक है, अधिवेशन केवल पार्टी अध्यक्ष बुलवा सकता है। अखिलेश यादव के अध्यक्ष बनने को भी असंवैधानिक बताते हुए कहा गया कि मुलायम सिंह यादव ही सपा के अध्यक्ष हैं। जब सपा अध्यक्ष पद खाली था ही नहीं तो अखिलेश उस पर कैसे काबिज कराए जा सकते हैं?
लेकिन चुनाव आयोग ने माना, सपा में टूट हुई
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1. अपनी ही चिट्ठी से फंसे मुलायम: 30 दिसंबर को मुलायम सिंह ने आयोग को लिखे पत्र में साफ संकेत कर दिया था कि पार्टी में टूट हुई है। इसके बाद रामगोपाल का अधिवेशन बुलाना, इसमें अखिलेश यादव को अध्यक्ष बनाना, मुलायम सिंह यादव का अधिवेशन को असंवैधानिक ठहराना और राष्ट्रीय अध्यक्ष पद पर अपना दावा करना साफ करते हैं कि पार्टी में विभाजन था।
तीन जनवरी को आयोग को रामगोपाल के पत्र में अखिलेश यादव के अध्यक्ष के रूप में मान्यता पाने की बात गलत पढ़ी गई है। इसमें कहा गया है कि ‘समाजवादी पार्टी जिसका प्रतीक साइकिल है और अध्यक्ष अखिलेश यादव हैं, उसे चुनाव आयोग को मान्यता देनी चाहिए।’
यानी मान्यता अखिलेश यादव को अध्यक्ष के तौर पर नहीं, बल्कि उस समाजवादी पार्टी के लिए चाही गई थी, जिसके अध्यक्ष अखिलेश हैं। यह दावे निर्धारित करने के लिए काफी हैं जिसमें निर्वाचन प्रतीक आदेश के पैरा 15 के तहत आयोग निर्णय करे।
2. नौ जनवरी को मुलायम ने आयोग को दिए हलफनामे में दावा किया था कि वे सपा के अध्यक्ष हैं। उनके वकील का कहना था कि अखिलेश यादव ने निर्वाचन प्रतीक साइकिल और पार्टी के नाम पर कोई दावा नहीं किया है, लेकिन यह सही नहीं है। अखिलेश और रामगोपाल ने इन पर दावा किया था।
3. अगर फिर भी कोई संशय रहा है तो वह मुलायम सिंह के समूह की ओर से अमर सिंह के तीन जनवरी के आयोग को लिखे पत्र से दूर हो जाता है, जिसमें उन्होंने खुद को सपा का महासचिव बताया है, साथ ही कहा है कि आयोग पार्टी में विभाजन पैदा कर रहे समूह के दावे को दरकिनार करते हुए साइकिल और सपा पर निर्णय ले।
निष्कर्ष: चुनाव आयोग ने कहा कि वह सपा में टूट होने की बात पर संतुष्ट है।
ये रही मुलायम व अखिलेश की दलीलें
मुद्दा दो : अगर टूट हो चुकी है तो निर्वाचन प्रतीक आदेश के लिहाज से कौन-सा घटक या समूह समाजवादी पार्टी है?
अखिलेश की दलील : बहुमत किसके साथ है, यह देखे आयोग
अखिलेश खेमे का कहना था कि इस पर आयोग बहुमत के आधार पर निर्णय करे। खुद सुप्रीम कोर्ट ने विभिन्न मामलों में इसी प्रक्रिया को सही माना है। आयोग को यह निर्णय नहीं करना है कि क्या विरोधी समूह पार्टी के संविधान के अनुसार काम कर रहे हैं, नेता सही तरीके से निकाले जा रहे या गलत तरीके से, ये मामले तो सिविल कोर्ट में देखे जाते हैं, जहां निर्णय आने में सालों-साल लग जाते हैं। ऐसा होता रहा तो राजनीतिक दल काम कैसे करेंगे?
मुलायम सिंह ने कहा-पार्टी संविधान तोड़ने वालों को देखो
दूसरी ओर मुलायम सिंह की ओर से कहा गया कि आयोग को देखना चाहिए कि कौन-सा समूह पार्टी के संविधान के अनुसार काम कर रहा है। अखिलेश यादव का समूह ऐसा नहीं कर रहा है। अखिलेश यादव को सपा का अध्यक्ष बनाया गया, लेकिन उसके पहले मुलायम सिंह को अध्यक्ष पद से नहीं हटाया गया।
जब पद खाली ही नहीं था तो दूसरे का चयन कैसे हो सकता है? और बहुमत के आधार पर निर्णय तभी हो सकता है जब पार्टी में टूट हो। ऐसे में समाजवादी पार्टी में जो भी विवाद हैं, उन्हें आयोग द्वारा पार्टी के संविधान के अनुसार सुलझाया जाना चाहिए।
...और इस तरह आयोग ने लिया निर्णय
- आयोग ने साफ किया कि विवाद की स्थिति में बहुमत के परीक्षण पर निर्णय होना है जिसे सुप्रीम कोर्ट ने भी सही माना है। सपा के मामले में दोनों ही समूहों ने एक-दूसरे के सदस्यों को पार्टी से निकाला या पद से हटाया है, जिनमें खुद सीएम और पार्टी अध्यक्ष भी शामिल हैं।
किसी सदस्य पर कार्रवाई के लिए सपा के संविधान के सेक्शन 30 के अनुसार तीन सदस्यीय समिति निर्णय करती है, ऐसी कोई समिति नहीं बनी। राष्ट्रीय कार्यकारिणी समिति बैठक का आयोजन भी पार्टी संविधान के सेक्शन 15(10) के अनुसार हर दो महीने में होना चाहिए लेकिन अक्तूबर 2014 के बाद कोई बैठक नहीं हुई।
किसी भी लोकतांत्रिक संस्था में, चाहे वह राजनीतिक दल ही क्यों न हो, बहुसंख्यकों की बात अगर सुनी नहीं जाएगी, तो यह अल्पसंख्यकों द्वारा उत्पीड़न बनकर रह जाएगी। ऐसे में यह नहीं कहा जा सकता कि कौन-सा समूह पार्टी के संविधान के अनुसार काम कर रहा है। एक जनवरी 2017 को हुआ अधिवेशन बहुसंख्यकों को अपनी बात रखने का मौका था। लेकिन आयोग को इस पर सवाल करने की जरूरत नहीं है।
मुलायम नहीं बता पाए कि उनके साथ कौन?
- दूसरी ओर सपा के अधिवेशन में आए पदाधिकारियों, विधायकों और सांसदों की संख्या यह स्पष्ट करती है कि बहुमत अखिलेश के साथ है। इसमें पार्टी के 46 में से 28 राष्ट्रीय कार्यकारिणी सदस्य, 228 में से 205 विधायक, 68 में से 56 एमएलसी, पांच में से चार लोकसभा सांसद, 19 में से 11 राज्यसभा सांसद, 5,731 में से 4400 राष्ट्रीय अधिवेशन प्रतिभागी शामिल हुए थे।
आयोग ने मुलायम से भी पूछा था कि वे बताएं, उनके साथ संगठन के कितने सदस्य हैं? लेकिन उन्होंने इसका कोई जवाब नहीं दिया।
- वहीं यूपी में चुनाव निकट हैं, 73 विस सीटों के लिए 17 जनवरी को अधिसूचना जारी होनी है। सामने आए तथ्यों, एक जनवरी के अधिवेशन के आंकड़ों से स्पष्ट होता है कि पार्टी का बहुमत अखिलेश के साथ है। ऐसे में अखिलेश यादव का समूह ही समाजवादी पार्टी है और वह नाम और साइकिल निर्वाचन प्रतीक उपयोग करने का पात्र है।
आयोग ने इसलिए शक्ति परीक्षण को दिया महत्व
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वर्ष 1972 के सादिक अली बनाम भारतीय चुनाव आयोग व अन्य के मामले में सुप्रीम कोर्ट ने निर्णय दिया था कि किसी राजनीतिक दल के भीतर विभाजनकारी घटक बनने और उनमें विवाद होने की स्थिति में संगठन के सदस्यों द्वारा ‘टेस्ट ऑफ मेजॉरिटी सपोर्ट’ के जरिए विवाद का निर्णय किया जाना चाहिए।
आयोग ने मुलायम के वकीलों के तर्क को दरकिनार करते हुए कहा कि सेक्शन 29-ए केवल राजनीतिक दलों के रजिस्ट्रेशन को लेकर है। ऐसे में निर्वाचन प्रतीक आदेश के पैरा 15 के तहत टेस्ट ऑफ मेजॉरिटी सपोर्ट अब भी उपयोग किया जा सकता है।