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रुतबे की सवारी को कैसे कह दें अलविदा?

Thu, 29 May 2014 01:06 PM IST
नीरज 'अंबुज'/अमर उजाला, लखनऊ
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हमेशा हमारी यादों में बसी रहेगी आजाद मुल्क की पहली कार एम्बेसडर। अफसर हों या ड्राइवर या फिर नेता या अवाम, जिसने भी इसकी सवारी की, अलग ही रुतबा महसूस किया।
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कारें तो इससे कहीं ज्यादा कीमत की भी सड़कों पर दौड़ रही हैं, लेकिन शाही सवारी का दर्जा सिर्फ एम्बेसडर को ही मिल सका। पहाड़ हों या मैदान, जंगल हों या ऊबड़-खाबड़ रास्ते, हर कहीं आसानी से दौड़ पड़ती।

सिफत यह भी कि विपरीत परिस्थितियों में सारी चोट खुद पर ले लेती है और अंदर बैठे लोग पूरी तरह से महफूज रहते हैं।

ऐसे में जब रविवार को एम्बेसडर कार बनाने वाली कंपनी हिन्दुस्तान मोटर्स ने अपने कलकत्ता प्लांट पर प्रोडक्शन रोकने के बारे में निर्णय लिया तो एम्बेसडर प्रेमियों में मायूसी छा गई।
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जब एम्बेसडर इस्तेमाल करने वाले पूर्व ब्यूरोक्रेट्स से ‘अमर उजाला’ ने बातचीत की तो उनका दर्द उनकी स्मृतियों के जरिए उभर आया।

धड़धड़ाकर घुस गई जंगलों में
घने जंगल और ऊबड़-खाबड़ रास्ते पर धड़धड़ाकर घुस जाती। अपराधियों की धरपकड़ के लिए एक नहीं कई ऐसे ऑपरेशन किए, जिसमें एम्बेसडर ने एक सहकर्मी की तरह साथ दिया। एम्बेसडर के प्लांट का बंद होना दुखद है।

चूंकि, देहाती माहौल के अनुसार एम्बेसडर से अच्छी कोई गाड़ी पुलिसवालों के लिए नहीं थी। जिसमें पूरी टीम आसानी से बैठ सकती। पहले तो हैंडिल लगाकर स्टार्ट करना पड़ता था। अब जो प्लास्टिक मॉडल बेस्ड गाड़ियां आ रही हैं, वे एम्बेसडर जैसी मजबूत कारों के आगे कहीं नहीं ठहरती।
-केएल गुप्त, पूर्व डीजीपी

आज भी चलते हैं तोतापरी-लालपरी के किस्से
बात उस वक्त की है, जब गोरखपुर की बांसगांव तहसील में एसडीएम था। उस वक्त  लाल रंग की पर्सनल एम्बेसडर थी। जबकि डीएम के पास हरे रंग की। दोनों एम्बेसडर पूरे इलाके में लालपरी और तोतापरी के नाम से चर्चित थी।
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जिनके किस्से आज भी सुनाई पड़ते हैं। एम्बेसडर जैसी लोहालाट गाड़ी का विकल्प तैयार करना आसान नहीं।
-आरपी शुक्ल, पूर्व प्रशासनिक अधिकारी
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