विकास प्राधिकरणों की कार्यशैली पर सख्त ऐतराज जताते हुए हाईकोर्ट की लखनऊ पीठ ने कहा कि आज तक ऐसी कोई कार्य संस्कृति विकसित नहीं हो पाई है, जिससे आम जनता की दिक्कतों को आसानी से दूर किया जा सके।
प्राधिकरण नियम कानून ताक पर रखकर आवंटियों को इस पटल से उस पटल पर दौड़ाते रहते हैं। उनके गैरजिम्मेदार और संवेदनहीन रवैये से आवंटियों को न केवल वित्तीय बल्कि तमाम मानसिक तकलीफों से गुजरना पड़ता है।
दिया दो सप्ताह में मामले को निपटाने का आदेश
कोर्ट ने यह तल्ख टिप्पणी 72 वर्षीय चंद्रशेखर राजन की याचिका पर लखनऊ विकास प्राधिकरण (एलडीए) पर की।
कोर्ट ने बृहस्पतिवार को इस पर फैसला करते हुए एलडीए को आदेश दिया कि वह 12 साल से प्लॉट पर कब्जे के लिए भटक रहे राजन को दो हफ्ते में कब्जा दिलाए।
साथ ही लापरवाही बरतने के लिए एलडीए पर दो लाख रुपये का जुर्माना भी ठोंका।
सुप्रीम कोर्ट के आदेश भी कर देते हैं नजरअंदाज
न्यायमूर्ति देवी प्रसाद सिंह और न्यायमूर्ति अरविंद कुमार त्रिपाठी द्वितीय की खंडपीठ ने बृहस्पतिवार को कहा कि विकास प्राधिकरणों के रवैये से लगता है कि उन्हें हाईकोर्ट और सुप्रीमकोर्ट के आदेशों की भी कोई परवाह नहीं है।
हाईकोर्ट और सर्वोच्च न्यायालय ने विकास प्राधिकरणों की साफ-सुथरी कार्य संस्कृति विकसित करने लिए कई आदेश पारित किए, लेकिन सब नजरअंदाज कर दिए जाते हैं।
हाईकोर्ट ने मामले पर कहा कि ‘72 साल केसरकारी कर्मचारी की पीड़ा तथा उसके परिजनों द्वारा झेला जा रहे दर्द को रकम के रूप में क्षतिपूर्ति नहीं की जा सकती है।’