लखनऊ। हाईकोर्ट की लखनऊ पीठ ने अर्जुनगंज फायरिंग रेंज की जमीन पर अतिक्रमण मामले में एलडीए और आवास विकास परिषद से पूछा है कि पहले दिए गए आदेश के तहत अतिक्रमण का सर्वे करने के लिए क्या कार्रवाई हुई। मामले की अगली सुनवाई 22 सितंबर को होगी।
न्यायमूर्ति राजन रॉय और न्यायमूर्ति मंजीव शुक्ल की खंडपीठ ने ब्रिगेडियर त्रिवेणी प्रसाद की 2011 में दाखिल जनहित याचिका पर यह सवाल किया। याचिका में कहा गया था कि फायरिंग रेंज की जमीनों पर अवैध कब्जे सेना की ट्रेनिंग में बाधा डाल रहे हैं। बीते 12 अगस्त को सुनवाई के दौरान भी कोर्ट को न्यायमित्र ने बताया था कि सेना के बार-बार अनुरोध के बावजूद राज्य सरकार और एलडीए के अफसर चुप्पी साधे रहे, जिससे अवैध कब्जे बढ़ते गए। अब सेना वहां लॉन्ग रेंज फायरिंग प्रैक्टिस नहीं कर पा रही है।
केंद्र और राज्य सरकार का पक्ष
कोर्ट के आदेश पर केंद्र सरकार ने हलफनामा दाखिल कर बताया है कि अतिक्रमण की वजह से सेना भारी और घातक हथियारों का अभ्यास नहीं कर पा रही। हाल ही में हुए ऑपरेशन सिंदूर के दौरान सेना को ऐसे हथियारों की ट्रेनिंग की जरूरत पड़ी थी। इसलिए अतिक्रमण हटाना बेहद जरूरी है। केंद्र सरकार के वकील ने कोर्ट को बताया कि फायरिंग रेंज की अधिसूचना वर्ष 1977 में जारी हुई थी और समय-समय पर इसे बढ़ाया जाता रहा। वर्तमान अधिसूचना सितंबर 2025 में समाप्त हो रही है। अधिसूचना की अवधि बढ़ाने का अनुरोध पहले ही राज्य सरकार से किया जा चुका है। इस पर कोर्ट ने सरकार को जल्द निर्णय लेकर अवगत कराने का निर्देश दिया।
वहीं राज्य सरकार की अधिवक्ता ने कोर्ट को बताया कि फायरिंग रेंज का सर्वे करने के लिए अधिकारियों की टीम गठित कर दी गई है। साथ ही 11 दिसंबर 2020 की अधिसूचना को बढ़ाने पर 30 सितंबर से पहले निर्णय लिया जाएगा।