हाईकोर्ट की लखनऊ खंडपीठ ने तहसील व कलेक्ट्रेट कार्यालयों में चतुर्थ श्रेणी के रिक्त 3833 पदों पर आउटसोर्सिंग के जरिए भर्ती की कार्यवाही में अनियमितता के आरोप में सेवा प्रदाता कंपनी को ब्लैकलिस्ट करने के आदेशों को रद्द करते हुए नए सिरे से जांच कराने को कहा है। अदालत ने जांच संबंधी प्रक्रिया पर सवाल उठाते हुए संबंधित आदेशों के अमल पर भी रोक लगा दी है।
न्यायमूर्ति अजय लांबा व नरेंद्र कुमार जौहरी की खंडपीठ ने यह आदेश एवीएसएम सिक्योरिटीज व आउटसोर्सिंग सर्विसेज नामक कंपनी की याचिका पर दिए। याचिका में कहा गया कि राजस्व परिषद के प्रस्ताव पर लघु उद्योग निगम ने तहसील व कलेक्ट्रेट कार्यालयों में चतुर्थ श्रेणी के रिक्त 3833 पदों पर आउटसोर्सिंग के जरिए भर्ती की कार्यवाही शुरू की थी।
कंपनी को भी तय नियमों का पालन करते हुए सेवा प्रदाता के तौर पर इम्पैनल किया गया था। इसके लिए बाकायदा अनुबंध भी किया गया। कंपनी ने काम भी किया, पर उसे ब्लैकलिस्ट कर दिया गया।
याची के अधिवक्ता अमरेंद्र नाथ त्रिपाठी ने दलील दी कि इस मामले में जांच की गई, लेकिन न तो जांच प्रक्रिया के दौरान, न ही फैसला लेते समय याची का पक्ष सुना गया या उसे सफाई का कोई मौका दिया गया।
अधिवक्ता ने इसे नागरिक अधिकारों के विपरीत बताते हुए ऐसे ही एक मामले में सर्वोच्च न्यायालय के फैसले की नजीर भी पेश की। याचिका में इस मुद्दे पर 2 व 3 मई को लिए गए तीन निर्णयों का भी हवाला दिया गया।
अदालत ने दोनों पक्षों की दलीलें सुनने के बाद कहा कि याची पक्ष को जांच पूरी करने से पहले और आदेश जारी करते समय पक्ष रखने का मौका नहीं दिया गया। यह याची के नागरिक अधिकारों का हनन है। याची को ब्लैकलिस्ट करने से पहले पक्ष रखने का मौका दिया जाना चाहिए था। याची का प्रकरण सर्वोच्च न्यायालय द्वारा दिए गए निर्णय के अधीन आता है।
अदालत ने इसके साथ ही अपर मुख्य सचिव राजस्व के इस मामले में 2 मई को दिए गए आदेश व राज्य सरकार और लघु उद्योग निगम के प्रबंध निदेशक के 3 मई को दिए गए अलग-अलग आदेशों को रद्द कर दिया।
कोर्ट ने अधिकारियों को इस बात की छूट दी कि वे चाहें तो याची के खिलाफ नए सिरे से जांच शुरू कर सकते हैं, पर कानून की मंशा के तहत। अदालत ने कहा कि अगर कोई आदेश जारी किया जाता है तो उससे पहले याची का पक्ष भी सुना जाए।
यह था मामला
लघु उद्योग निगम ने राजस्व परिषद के प्रस्ताव पर तहसील व कलेक्ट्रेट में चतुर्थ श्रेणी के रिक्त 3833 पदों पर आउटसोर्सिंग के जरिए भर्ती की कार्यवाही शुरू की थी। भर्ती प्रक्रिया को लेकर शिकायत हुई कि टेंडर नियमों का उल्लंघन कर गोपनीय तरीके से इच्छुक अभ्यर्थियों से धन उगाही कर नियुक्ति पत्र जारी किए गए।
मामला मुख्यमंत्री तक पहुंचा जहां से मामले की जांच एपीसी से कराए जाने के आदेश दिए गए थे। जांच में आरोपों की पुष्टि होने पर मुख्यमंत्री ने एपीसी की रिपोर्ट पर आईएएस अधिकारी केदार नाथ (तत्कालीन प्रबंध निदेशक लघु उद्योग निगम) व पीसीएस अधिकारी तथा उप भूमि व्यवस्था आयुक्त राजस्व परिषद सुनील कुमार चौधरी सहित सभी जिम्मेदार कर्मियों के खिलाफ भ्रष्टाचार निरोधक कानून के अंतर्गत एफआईआर दर्ज कराने का आदेश आयुक्त एवं सचिव राजस्व परिषद को दिया।
इस मामले में सतर्कता जांच कराने, निलंबन व अनुशासनिक कार्रवाई करने, सेवा प्रदाता संस्थाओं को ब्लैकलिस्ट करने जैसे आदेश भी हुए। साथ ही चयनित चतुर्थ श्रेणी कर्मियों से सेवा न लेने के निर्देश दिए गए।