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यूपी: किशोर को लापरवाही से गिरफ्तार कर हिरासत में भेजने पर हाईकोर्ट सख्त, पुलिस और मजिस्ट्रेटों को दी चेतावनी

Thu, 27 Aug 2026 11:06 PM IST
Bhupendra Singh अमर उजाला ब्यूरो, लखनऊ

सार

किशोर को लापरवाही से गिरफ्तार कर हिरासत में भेजने पर हाईकोर्ट सख्त है। पुलिस और मजिस्ट्रेटों को कड़ी चेतावनी दी है। साथ ही कहा कि इस मुद्दे को हल्के में न लें। आगे पढ़ें पूरी खबर...
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हाईकोर्ट की लखनऊ पीठ।
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विस्तार
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हाईकोर्ट की लखनऊ पीठ ने पुलिस अधिकारियों और न्यायिक अधिकारियों को सात साल तक की सजा के प्रावधान वाले अपराधों में किशोर की गिरफ्तारी और रिमांड के मामलों में "लापरवाह या संवेदनहीन रवैया" अपनाने के खिलाफ सख्त चेतावनी दी है। कोर्ट ने कहा कि सभी संबंधित अधिकारी/ न्यायिक अधिकारी इस मुद्दे को हल्के में न लें।

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अदालत ने यह टिप्पणी लखनऊ के एक किशोर अपचारी से संबंधित बंदी प्रत्यक्षीकरण याचिका के संदर्भ में की, जिसे एक ऐसे मामले में बार-बार न्यायिक हिरासत में भेजा गया था, जिसमें अधिकतम सजा तीन साल थी और एक अन्य प्रावधान के जुड़ने के बाद पांच साल हो गई थी।

मुद्दे को हल्के में न लें

कोर्ट ने कहा अगर अंत में, अवैध कारावास का तथ्य, यदि सिद्ध हो जाता है, तो इसे गंभीरता से लिया जाना चाहिए और दोषी अधिकारी/ न्यायिक अधिकारियों को बख्शा नहीं जाना चाहिए। इसलिए, सभी संबंधित अधिकारी/ न्यायिक अधिकारी उपरोक्त मुद्दे को हल्के में न लें।

न्यायमूर्ति राजेश सिंह चौहान और न्यायमूर्ति दिवेश चंद्र सामंत की खंडपीठ ने नाबालिग किशोर की ओर से दायर याचिका पर यह आदेश पारित किया। अदालत ने पहले, याचिका का निपटारा करते हुए किशोर की हिरासत को प्रथम दृष्टया अवैध पाया था। उसे तत्काल जेल से रिहा करने का निर्देश दिया था।

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चार के खिलाफ एफआईआर दर्ज की गई थी

मामले के अनुसार, चार आरोपियों के खिलाफ एफआईआर दर्ज की गई थी, जिसमें याचिकाकर्ता, जो एक नाबालिग है, को आरोपी संख्या-1 के रूप में दर्शाया गया था। प्रारंभ में, चोरी के अपराध से संबंधित भारतीय न्याय संहिता की धारा 303 (2) लगाई गई थी, जिसमें अधिकतम तीन वर्ष की सजा का प्रावधान है। हालांकि, याचिकाकर्ता की गिरफ्तारी के बाद, चोरी की संपत्ति प्राप्त करने या रखने से संबंधित धारा 317 (2) बीएनएस जोड़ी गई, जिसमें अधिकतम पांच वर्ष की सजा का प्रावधान है। 

इसके बाद, उसे विभिन्न क्षेत्राधिकारों के मजिस्ट्रेटों द्वारा बार-बार न्यायिक हिरासत में भेजा गया। इससे पहले, 4 जून को मामले की सुनवाई करते हुए, उच्च न्यायालय ने चोरी के आरोप में जेल भेजे गए नाबालिग को तत्काल रिहा करने का आदेश दिया था, और उसकी हिरासत को प्रथम दृष्टया 'अवैध' बताया था।

नोटिस तामील कराया जाना चाहिए

अदालत ने सतेंद्र अंतिल मामले में सर्वोच्च न्यायालय के निर्देशों का हवाला दिया, जिसमें यह कहा गया था कि सात वर्ष से कम कारावास की सजा वाले अपराधों के मामलों में आरोपी को गिरफ्तार करने के बजाय भारतीय नागरिक सुरक्षा संहिता की धारा 35(3) के तहत नोटिस तामील कराया जाना चाहिए। इस वर्ष की शुरुआत में, सर्वोच्च न्यायालय ने दोहराया कि सात वर्ष तक की सजा वाले अपराधों में गिरफ्तारी अपवाद है, नियम नहीं।

सुप्रीम कोर्ट ने मजिस्ट्रेटों को यह भी निर्देश दिया कि वे ऐसे मामलों में गिरफ्तारी की वैधता और वैधानिक सुरक्षा उपायों के पालन की जांच किए बिना यांत्रिक रूप से रिमांड न दें। इसके अलावा, उच्च न्यायालय ने इस मामले में एक और महत्वपूर्ण खामी पाई थी।
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अधिकारी और न ही मजिस्ट्रेट ने आयु की पुष्टि की

याचिकाकर्ता के स्थानांतरण प्रमाणपत्र में उसकी जन्मतिथि 18 अप्रैल, 2009 दर्ज थी। चूंकि एफआईआर 27 अप्रैल, 2026 को दर्ज की गई थी, इसलिए उस समय उसकी आयु 17 वर्ष से कम थी। हालांकि, हिरासत में लेने से पहले न तो गिरफ्तार करने वाले अधिकारी और न ही मजिस्ट्रेट ने उसकी आयु की पुष्टि की।

अदालत ने टिप्पणी की कि यदि मजिस्ट्रेट ने याचिकाकर्ता की उम्र सत्यापित कर ली होती, तो रिमांड आवेदन को स्वीकार करके नाबालिग को न्यायिक हिरासत में नहीं भेजा जा सकता था। अदालत ने यह भी गौर किया कि इस मामले में एक अन्य नाबालिग भी शामिल था और सवाल उठाया कि जब दूसरे व्यक्ति के नाबालिग होने की पुष्टि हो चुकी थी तो पुलिस ने याचिकाकर्ता की उम्र का पता क्यों नहीं लगाया।

अदालत ने यह भी पाया कि याचिकाकर्ता को गिरफ्तारी के आधार की सूचना नहीं दी गई थी, इस तथ्य पर सरकारी वकील ने कोई विवाद नहीं किया। कोर्ट ने निर्देश दिया कि यदि किशोर होने का तर्क उठाया जाता है, तो संबंधित अधिकारियों द्वारा कानून के अनुसार इस पर सख्ती से विचार किया जाएगा। अदालत ने तदनुसार, बंदी प्रत्यक्षीकरण याचिका का अंतिम निपटारा कर दिया गया।
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