हाईकोर्ट के समक्ष लड़की की कक्षा पांच की टीसी प्रस्तुत की गई, जिसमें उसका जन्म फरवरी 2002 में दर्शाया गया था। यही वजह थी कि बाल कल्याण समिति ने दिसंबर 2017 में उसे 15 वर्ष और नौ महीने की मानते हुए महिला शरणालय भेजने का आदेश दिया था।
इसी दौरान उसने एक बच्चे को जन्म दिया, जो अब दो महीने का हो चुका है। नाबालिग मां व उसका बेटा इस समय महिला शरणालय में ही रह रहे हैं। वहीं उसके ऑसिफिकेशन टेस्ट की रिपोर्ट प्रस्तुत की गई, जिसमें सीएमओ बाराबंकी ने लड़की की उम्र 17 वर्ष बताई।
‘लेकिन विवेक का उपयोग करने में वयस्क’
मामले को सुनने के बाद हाईकोर्ट ने अपने आदेश में कहा कि उसे नाबालिग लड़की और उसके नवजात बच्चे के हितों के बारे में सोचना होगा जिन्हें ऑसिफिकेशन रिपोर्ट के आधार पर महिला शरणालय में एक वर्ष और जीना पड़ सकता है। लेकिन कोर्ट का यह मानना है कि व्यक्ति की कस्टडी व उसे बंदी रखने की दशा के निर्णय लेते समय जीवन और स्वतंत्रता के अधिकार को सर्वोपरि रखा जाना चाहिए।
ऑसिफिकेशन टेस्ट में 2 से 3 वर्ष का मार्जिन माना जाता है। इस लिहाज से उसकी उम्र अधिकतम 19-20 वर्ष भी हो सकती है। उससे बातचीत के दौरान कोर्ट ने पाया है कि वह अपने विवेक का इस्तेमाल करने लायक वयस्क है। ऐसे ही मामलों में सुप्रीम कोर्ट भी लड़की की इच्छा को महत्व देने संबंधी निर्णय दे चुका है। उसके बयानों, हालात और लड़की व उसके बच्चे के हित को देखते हुए बाल कल्याण समिति का आदेश खारिज किया जाता है। लड़की को रिहा करने व उसे उसकी मर्जी के अनुसार जाने देने के निर्देश दिए जाते हैं।