एक समुदाय के लोगों को तीर्थ यात्रा पर रवाना किए जाने का जलसा था। मुख्यमंत्री को हरी झंडी दिखाकर तीर्थ यात्रियों को रवाना करना था।
सीएम के हमसाये की तरह रहने वाले मंत्री यहां भी साथ थे। कार्यक्रम था सूबे के सबसे कद्दावर वजीर का जो अपने आगे किसी को कुछ नहीं समझते।
जैसे ही कार्यक्रम शुरू हुआ मंच पर चार कुर्सियों में से सीएम दूसरे नंबर की कुर्सी पर बैठ गए। सीएम ने बायीं ओर वाली कुर्सी छोड़ दी, जबकि दाहिनी तरफ एक धर्मगुरु आकर बैठ गए।
इसके बाद सीएम के बगल वाली खाली कुर्सी देख हमसाया मंत्री ने तशरीफ रख दी। वजीर माइक पर खड़े थे। सीएम के बगल की कुर्सी पर उनके साथ आए मंत्री को बैठना उन्हें नागवार गुजरा।
उन्होंने आव देखा न ताव मंच से ही मंत्री से कहा कि ...जनाब! कम से कम यहां पर तो हमें बगल वाली कुर्सी पर बैठ जाने दीजिये। दूसरी कुर्सी की तरफ इशारा करते हुए बोले आप यहां तशरीफ लाइए...।
मंत्री महोदय सकपका गए और सीएम के बगल वाली कुर्सी छोड़कर दूसरी कुर्सी पर बैठ गए। अपनी कुर्सी सुरक्षित करने के बाद ही वजीर ने कार्यक्रम शुरू होने दिया...।