यूपी के राजनीतिक गलियारे और प्रशासनिक गलियों में आज तीन किस्से काफी चर्चा में रहे। चाहे-अनचाहे आखिर ये बाहर आ ही जाते हैं। इन्हें रोकने की हर कोशिश नाकाम होती है। आज की कड़ी में 'कमिश्नर बहादुर का जजिया कर' की कहानी। इसके अलावा 'सांसद तो बड़े शातिर' और 'साहब ने मैनेज कर दी जांच' के किस्से भी चर्चा में रहे।
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कमिश्नर बहादुर का जजिया कर
कमिश्नर बहादुर ने महोत्सव के नाम पर 10 करोड़ रुपये इकट्ठा करवाया। सभी विभागों पर जजिया कर लगाकर यह रकम वसूली गई। शिक्षा से लेकर आबकारी, गांव का विकास करवाने वालों से लेकर उद्योगपतियों तक को नहीं बख्शा गया। पुरानी कहावत है-मरता क्या नहीं करता। सो सब ने जजिया कर तो दे दिया, पर मलाल उन्हें इस बात का है कि महोत्सव पर इसमें से दो करोड़ रुपये भी खर्च नहीं हुआ। बाकी की रकम का हिसाब-किताब तो कमिश्नर बहादुर ही दे पाएंगे।
सांसद तो बड़े शातिर
अरबों रुपये की बेनामी संपत्ति अर्जित करने वाले एक सांसद बड़े शातिर निकले। उनकी एक बेशकीमती संपत्ति पर आयकर विभाग ने चाबुक चलाया, लेकिन उसे सांसद की साबित नहीं कर पाया। विभाग के तेजतर्रार अफसर भी सांसद की चालबाजी के आगे हार मान गए।उनको फंसाने में संपत्ति पर हुई कार्रवाई खारिज होने का डर था, लिहाजा मन मारकर उनका नाम हटाया गया। फिर भी एक अधिकारी ने खुरपेंच कर दी और ''इंटरेस्टेड'' लोगों की फेहरिस्त में उनका नाम जोड़ दिया। किसी ने खूब कहा है कि तुम डाल-डाल तो मैं पात-पात।
साहब ने मैनेज कर दी जांच
चर्चित कफ सिरप कांड की आंच कारागार तक पहुंची थी। वहां का एक कर्मचारी गिरोह का कारखास था, जिसे निलंबित कर दिया गया था। अब आगे की कार्रवाई होनी थी लेकिन सिरप का असर ही कुछ ऐसा है कि समय के साथ साथ सब शांत हो गया। साहब ने जांच ही मैनेज कर दी। न जांच होगी और न उस कारखास को कोई सजा भुगतनी पड़ेगी।