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मौका मिला तो दिलों पर छा गए गुलाम अली

Mon, 08 Feb 2016 02:55 AM IST
ब्यूरो/अमर उजाला, लखनऊ
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एक बार फिर गजलों का बादशाह था और गंगा-जमुनी तहजीब का शहर था। गजलें सिर्फ गजलें नहीं थीं वे संगीत के माध्यम से विश्व भर को पैगाम थीं। उन लोगों को खासकर जो कला और कलाकार को भारत और पाकिस्तान में, हिंदू और मुस्लिम में, हिंदू और मुस्लिम में बांटना चाहते हैं।
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लगातार यह दूसरी बार था कि महाराष्ट्र में कार्यक्रम रद्द होने के बाद लखनऊ ने उन्हें गले लगाया था। रविवार को लखनऊ महोत्सव की आखिरी शाम गुलाम अली की गजलों के रंग में रंगी थी।

लगभग एक घंटे के कार्यक्रम में जब गुलाम अली गा रहे थे-‘कोई दीवार सी गिरी है अभी’ तो फिर दीवार खड़ी करने की कोशिशें नाकामयाब हो रही थीं।

अपने चिरपरिचित अंदाज में जिसमें शास्त्रीय संगीत का पुट, रागों की छाया, मुरकियों का प्रयोग और सरगम शामिल थे, गुलाम अली ने कई लोकप्रिय गजलें सुनाई। यह जरूर था कि जो उनकी पुरानी आवाज को ढूंढ रहे थे उन्हें उनकी उम्र के कारण थोड़ी निराशा जरूर हुई।
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इस तरह की कार्यक्रम की शुरूआत

गुलाम अली ने अपने कार्यक्रम का आरम्भ शेर-‘इश्क मुझको नहीं वहशत ही सही, मेरी वहशत तेरी शोहरत ही सही’ से करते हुए गालिब की गजल- ‘हरेक बात पे कहते हो तुम कि तू क्या है’ सुनाया। इसके बाद उन्होंने अपनी एक और गजल-‘करूं न याद मगर किस तरह भुलाऊं उसे, गजल बहाना करूं और गुनगुनाऊं उसे’ सुनाई।

गुलाम अली ध्वनि व्यवस्था को लेकर थोड़े परेशान दिखे वहीं उन्होंने कार्यक्त्रस्म के दौरान अधिकारियों और उनके परिवारों के बीच वितरित हो रहे जलपान पर भी आपत्ति जताई।

अपने कार्यक्त्रस्म में उन्होंने जब शेर-‘अंदाज अपना देखते हैं आईने में वो, और ये भी देखते हैं कि कोई देखता न हो..’ सुनाया तो पंडाल में तालियां गूंज उठीं।

वैसे उनकी हर गजल के आरम्भ और समापन पर तालियां तो गूंजती ही थीं, फरमाइशें भी खूब होती रहीं। इस क्त्रस्म में उन्होंने अपनी एक लोकप्रिय गजल-‘दिल में इक लहर सी उठी है अभी’ सुनाया।
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फरमाइश पर ये भी पेश किया

गुलाम अली ने अपने कार्यक्त्रस्म में जब कहा ‘कैसी चली है अबकी हवा तेरे शहर में, बंदे भी हो गए हैं खुदा तेरे शहर में’ तो लगा जैसे वे देश में विरोध करने वालों पर टिप्पणी कर रहे हैं।

उनकी गजल-‘हम तेरे शहर में आए हैं मुसाफिर की तरह’ भी उनके अपने भावों की अभिव्यक्ति की तरह लगी। फरमाइशों के बीच अपनी लोकप्रिय गजलें उन्होंने अपने बेटे आमिर गुलाम अली के साथ पेश कीं।

‘चुपके चुपके रात दिन’ लखनऊ के हसरत मोहनी की गजल है जो यहीं दफन भी हैं। यह फिल्म ‘निकाह’ में भी शामिल है। इस गजल के बाद उन्होंने अपनी एक और लोकप्रिय गजल ‘हंगामा है क्यूं बरपा’ सुनाई।
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