‘सपना देखा था कि दुनिया के हर देश को देखूंगा। फरवरी 2002 में पहली दफा मॉस्को जाने का मौका मिला। वहां प्लेन से उतरा तो एयरपोर्ट पर मौजूद कुछ अफसर करीब 50 डॉलर रिश्वत मांगने लगे।
मैंने कहा, मैं भारतीय हूं और रिश्वत नहीं दूंगा। जवाब में उन्होंने 30 घंटे के लिए मुझे एयरपोर्ट पर बंदी बनाए रखा और फिर भारत आ रहे प्लेन में बैठाकर लौटा दिया। यह मेरे सपने की शुरुआत थी, जो इतनी खराब होगी मैंने सोचा भी नहीं था।
लेकिन मैंने अपनी खराब शुरुआत को खराब भविष्य में बदलने से रोकने का निश्चय किया। अपनी ईमानदारी पर कायम रहा और बिना एक भी डॉलर रिश्वत दिए 2010 तक दुनिया के सभी 257 देश और स्वायत्त द्वीपों में घूम चुका था।
मेरे पासपोर्ट 14 किताबों का कंपाइलेशन हो गए। खराब शुरुआत से अगर मैं प्रभावित होता तो यह सब कतई नहीं कर पाता।’ आईआईएम लखनऊ में शुक्रवार से शुरू हुए सालाना जलसे ‘मेनफेस्ट वर्चस्व-2015’ के कार्यक्रम लीडर्स एक्सप्रेस में बतौर मुख्य वक्ता शामिल हुए दुनिया के जाने-माने गिटार वादक डॉ. बेन्नी प्रसाद ने अपने जीवन का प्रसंग सुनाया।
पहले ही दिन गिटार टीचर ने भगाया
बेन्नी ने कार्यक्रम के दौरान पैन फ्लूट और अपने बोंगो गिटार पर संगीत की मधुर प्रस्तुतियां भी दीं। 16 वर्ष की उम्र में मैंने तय किया कि गिटार सीखकर जिंदगी को एक मायने दूंगा। पर, पहले ही दिन सीखने गए तो क्लास खत्म होने के बाद शिक्षक ने कहा कि तुम नहीं सीख सकते, इसलिए कल से मत आना।
इस कदर टूटा कि गिटार छूट गया। पर, 1992 में मैंने फिर गिटार उठाया। खुद ही दिन में सात-सात घंटे प्रैक्टिस करता। अंगुलियां कम चलती थीं इसलिए मैंने गिटार में ही ड्रम जोड़ा।
यह प्रयास सफल रहा और मैं बोंगो-गिटार का जनक बन गया। अभ्यास और प्रयासों से महारत हासिल होती गई, लोकप्रियता भी मिलती गई। कई कॉन्सर्ट में प्रदर्शन के मौके मिले।
इनमें सबसे बड़ा मौका था 2004 के ग्रीस ओलंपिक की अपने बोंगो गिटार के प्रदर्शन के लिए बुलाया जाना। महज दो साल का था तभी रूमेटाइड आर्थराइटिस का शिकार हो गया। डॉक्टरों ने गलत दवा दे दी। नतीजा फेफड़े का 60 फीसदी हिस्सा भी खराब हो गया। आर्थराइटिस की वजह से अंगुलियों का मूवमेंट भी घटने लगा।
पढ़ाई में भी नहीं थे अच्छे
यही मेरे जीवन की शुरुआत थी। दुनिया घूमने के सपने की तरह यह भी बेहद खराब थी। सिर्फ शारीरिक कमजोरी ही नहीं थी, पढ़ाई में भी बहुत अच्छा नहीं था। हिंदी की शिक्षिका मुझको फेल करना अपना दायित्व समझती थीं।
पर, स्कूल अच्छे रिजल्ट के चक्कर में मुझे हर साल प्रमोट कर देता। यह सब क्लास 9 में फेल होने बाद खत्म हो गया। स्कूल प्रशासन ने मेरे अभिभावकों से कहा कि वे मेरे पास होने का सर्टिफिकेट दे सकते हैं।
पर उनकी शर्त थी कि मैं 10वीं में कहीं और पढ़ूं। नतीजा स्कूल बदला गया। इसी बीच तबीयत फिर से बिगड़ती गई। डॉक्टरों का मानना था कि मैं छह महीने से अधिक नहीं जी सकूंगा। मन में आत्महत्या के विचार आने लगे। लेकिन मां ने हिम्मत बंधाया और जीने को प्रेरित किया।
मुश्किलें
•60 प्रतिशत फेफड़े खराब
•अंगुलियों में आर्थराइटिस
•डॉक्टरों ने बचपन में कहा छह महीने में मर जाएंगे
•स्कूल में फेल होते रहे,
•गिटार शिक्षक ने पहले ही दिन लौटा दिया
•दुनिया के सभी देशों की यात्राएं कर चुके हैं।
•खुद ही गिटार बजाना सीखा और दो दफा ओलंपिक में परफॉर्म किया।
•उच्च शिक्षित नहीं, लेकिन उच्च शिक्षण संस्थानों में व्याख्यान देते हैं।
•सिस्टम को चुनौती दी जिसमें वे फिट नहीं हो रहे थे।
•खुद ही बोंगो गिटार का आविष्कार किया।