यहां वैदिक संस्कृति के भी प्रमाण मिलते तो रामायणकालीन साक्ष्य भी। प्रथम स्वतंत्रता संग्राम में सक्रिय भागीदारी लेने वाले शहर ने बेगम हजरत महल की बहादुरी देखी काकोरी केस के मुकदमे का साक्षी रहा तो महात्मा गांधी और जवाहर लाल नेहरू की पहली मुलाकात का भी गवाह। सुभाष चंद्र बोस और चंद्रशेखर आजाद के संघर्ष के साथ खड़े होने का भी लखनऊ साथी रहा।
आजादी के बाद भी इस शहर ने अपनी गौरवशाली परंपरा बनाए रखीं। अटल बिहारी वाजपेयी के रूप में इस शहर ने देश को प्रधानमंत्री दिया तो जवाहर लाल नेहरू की बहन पं. विजय लक्ष्मी पंडित को अपना प्रथम सांसद चुना। मुंशी नवल किशोर के रूप में लखनऊ के नाम एशिया का पहला बड़ा छापाखाना लगाने का कीर्तिमान जुड़ा।
यहां आम आदमी को भी खास होने का मौका मिलता रहा। जन्माष्टमी की साज-सज्जा मुस्लिम हाथों से तो हिंदुओं में ताजिये के नीचे से निकलने की होड़ इस शहर को अलग बनाती थी। आदिगंगा कही जाने वाली गोमती के प्राचीन स्वरूप का मिटना कष्ट देता है।
कुओं, बावड़ियों और तालाबों के शहर में इन पर छाया संकट, सौंदर्यीकरण के नाम पर ऐतिहासिक लक्ष्मण टीला पर प्रहार परेशान करने वाला है। बावजूद इसके लखनऊ को सिर्फ शहर भर कहना यहां की तौहीन है।
यह संस्कृतियों के समन्वय और सांप्रदायिक सद्भाव के साथ आधुनिकता से तालमेल कर बढ़ने वाला ऐसा स्थल है जो लोगों को हमेशा आकर्षित करता रहेगा। ‘पहले आप!’ कहते हुए।