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अमर उजाला लखनऊ संस्करण के स्थापना दिवस पर बिहार के राज्यपाल लालजी टंडन ने कही ये बातें

Mon, 24 Jun 2019 11:28 AM IST
ishwar ashish न्यूज डेस्क, अमर उजाला, लखनऊ
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बिहार के राज्यपाल व लखनऊ से सांसद रहे लालजी टंडन - फोटो : amar ujala
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जीवन के बीते 80 वर्षों की कड़ियां जोड़ता हूं तो लखनऊ की अनमोल विरासत के रहस्य परत दर परत खुलते चले जाते हैं। एक दौर था जब यहां वैदिक संस्कृति थी। फिर दौर रामायणकालीन आया जिसमें लक्ष्मणपुरी की स्थापना हुई। फिर कुषाणकाल, गुप्तकाल के दौर से होते हुए दौर उनका भी आया जिनका यहां की संस्कृति, इतिहास, परंपरा से कोई लेना-देना नहीं।

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ऐसे तुगलक, खिलजी जैसे सुल्तानों से होते हुए शेख, पठान, मुगलकाल, नवाबीकाल फिर ब्रिटिशकाल और आधुनिक लखनऊ तक विविध पड़ाव गवाह हैं, लखनऊ के सांस्कृतिक प्रवाह के और समृद्ध विरासत के।

तीन टीलों, अस्सी गांवों के कुल सत्ताइस किलोमीटर भूमि से शुरू हुई लक्ष्मणपुरी आज मेट्रोपोलिटन सिटी बनने के करीब है। कुछ लोगों ने यह भ्रम फैला रखा है कि यहां का  इतिहास सिर्फ 300 साल पुराना है। यह भ्रम दूर होना चाहिए। संसार के जितने मजहब और धाराएं हैं, सभी के पूजास्थल लखनऊ में हैं। शैव, शाक्त, बौद्ध, वैष्णव, अघोरपंथ के साथ नानकपंथी संगतें और कबीर पंथ के तमाम आश्रम मौजूद हैं। छाछीं कुआं हनुमान मंदिर तुलसीदास के आने का गवाह है तो यहियागंज गुरुद्वारा गुरु तेगबहादुर के ठहरने का।
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लगभग तीन हजार वर्ष प्राचीन कोणेश्वर महादेव का मंदिर भी यहां है। लखनऊ का इतिहास सिर्फ 300 वर्ष बताने वालों को जवाब देना चाहिए कि ये स्थान कहां से आ गए? अगर नवाबों और अंग्रेजों के पहले लखनऊ कुछ था ही नहीं तो बाबर, अकबर, जहांगीर लखनऊ क्यों आए थे? यहां पौराणिक काल, कुषाण काल और गुप्त काल के अवशेष कैसे पाए जाते हैं?

'यहां वैदिक संस्कृति के भी प्रमाण मिलते तो रामायणकालीन साक्ष्य भी'

यहां वैदिक संस्कृति के भी प्रमाण मिलते तो रामायणकालीन साक्ष्य भी। प्रथम स्वतंत्रता संग्राम में सक्रिय भागीदारी लेने वाले शहर ने बेगम हजरत महल की बहादुरी देखी काकोरी केस के मुकदमे का साक्षी रहा तो महात्मा गांधी और जवाहर लाल नेहरू की पहली मुलाकात का भी गवाह। सुभाष चंद्र बोस और चंद्रशेखर आजाद के संघर्ष के साथ खड़े होने का भी लखनऊ साथी रहा।

आजादी के बाद भी इस शहर ने अपनी गौरवशाली परंपरा बनाए रखीं। अटल बिहारी वाजपेयी के रूप में इस शहर ने देश को प्रधानमंत्री दिया तो जवाहर लाल नेहरू की बहन पं. विजय लक्ष्मी पंडित को अपना प्रथम सांसद चुना। मुंशी नवल किशोर के रूप में लखनऊ के नाम एशिया का पहला बड़ा छापाखाना लगाने का कीर्तिमान जुड़ा।
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'यहां आम आदमी को भी खास होने का मौका मिलता रहा'

यहां आम आदमी को भी खास होने का मौका मिलता रहा। जन्माष्टमी की साज-सज्जा मुस्लिम हाथों से तो हिंदुओं में ताजिये के नीचे से  निकलने की होड़ इस शहर को अलग बनाती थी। आदिगंगा कही जाने वाली गोमती के प्राचीन स्वरूप का मिटना कष्ट देता है।

कुओं, बावड़ियों और तालाबों के शहर में इन पर छाया संकट, सौंदर्यीकरण के नाम पर ऐतिहासिक लक्ष्मण टीला पर प्रहार परेशान करने वाला है। बावजूद इसके लखनऊ को सिर्फ शहर भर कहना यहां की तौहीन है।

यह संस्कृतियों के समन्वय और सांप्रदायिक सद्भाव के साथ आधुनिकता से तालमेल कर बढ़ने वाला ऐसा स्थल है जो लोगों को हमेशा आकर्षित करता रहेगा। ‘पहले आप!’ कहते हुए।
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