सीएम योगी ने कहा कि दो वर्षों के संस्कृत संस्थान के पुरस्कार एक साथ साधकों को दिए जा रहे हैं। मुझे आश्चर्य होता है कि संस्कृत की तुलना कुछ बोली या भाषा से करने लगते हैं। आज की भौतिकता के युग मे संस्कृत की पहचान बनी है तो संस्कृत के विद्वानों और श्रुति परंपरा के कारण। लेकिन, संस्कृत की दुर्गति के लिए भी संस्कृत से जुड़े लोग ही जिमेददार हैं।
सीएम ने कहा कि संस्कृत विद्यालय की मान्यता लोग ले लेते हैं लेकिन न वहां शिक्षक पढ़ाने जाते हैं और न ही छात्र पढ़ने जाते हैं। इसीलिए प्रतिस्पर्धा में बहुत पीछे छूट जाते हैं। उन्होंने कहा कि माध्यमिक संस्कृत शिक्षा परिषद के गठन में 17 वर्ष लग गए। वह भी तब जब मैंने हर महीने मॉनिटरिंग की। हालांकि, अभी भी यह ठीक से काम करेंगे इसमें संशय है।
योगी ने कहा कि मैंने संस्कृत संस्थान के अध्यक्ष से कहा कि क्या अवकाश के दिनों में हम विद्यालयों में संस्कृत संभाषण के कैम्प नहीं लगा सकते। जब अर्वाचीन और प्राचीन मिलेगा तब ही विकास होगा।
यह भाषण और नारेबाजी से नहीं होगा। इसके लिए समाज के समक्ष योग्यता कि कसौटी प्रस्तुत करनी होगी। योग्य विद्वानों को आगे लाना होगा। संस्कृत के विद्वानों और छात्रों को यह नेतृत्व करना होगा। योगी ने भरोसा दिलाया कि सरकार इसमें सहयोग करेगी।
आदित्यनाथ ने कहा कि बाकी भाषा इस लोक की है और संस्कृत परलोक की भाषा है। वहां का संवाद संस्कृत में ही होगा। जहां विज्ञान की सीमा समाप्त होती है वहां आध्यात्म प्रारम्भ होता है।
संस्कृत के विद्वान अपने बच्चों को कान्वेंट स्कूलों में पढ़ाते हैं। जब आप भी अपने बच्चे को संस्कृत नहीं पढ़ाएंगे तो दूसरे से कैसे अपेक्षा करेंगे। अपने अंदर की हीन भावना को छोड़ना होगा। हमने पिछले 150-200 वर्षों से कुछ नया सोचना और करना बंद कर दिया है।
योगी ने कहा कि जो यूरोप करता है, हम उसे अपने माथे पर बांध लेते हैं। आखिर वह बासी ज्ञान ही तो बांट रहे हैं। हम बृहस्पति का विमानन शास्त्र क्यों भूल गए? आधुनिक वैज्ञानिकों के साथ बैठ कर क्यों नहीं इस पर चर्चा करते हैं। हम शुश्रुत को क्यों भूल गए।
उन्होंने कहा कि गणेश और दक्ष की कथा बताती है कि हमारी शल्य चिकित्सा कितनी आगे थी। आज भी हम ऑर्गन ट्रांसप्लांट के लिए ब्लड ग्रुप मिलाते हैं जबकि तब जानवरों के सिर जोड़ दिए गए थे। चीन आज इस पर शोध कर रहा है।
सीएम ने कहा कि हमारी योजना है कि प्रदेश के सभी विद्यालयों में चाहे वह किसी बोर्ड या माध्यम का हो वहां सामान्य संस्कृत संभाषण हो सके, ऐसा माहौल बनाइए। उन्होंने कहा कि संस्कृत मां है, इसकी तुलना बहु या बेटे से नहीं हो सकती। इसलिए इसे विश्वभाषा की माता का गौरव दिलाइए। आप संवर्धन के लिए आगे आइये, हम सरंक्षण में पूरा सहयोग देंगे।