अपने सूबे के खजाने के मालिक तो बदल गए लेकिन उनके द्वारपाल जमे हुए हैं।
इन्हीं द्वारपालों ने पुराने वाले हाकिम को आम लोगों से दूर कर उनकी कुर्सी छिनवा दी।
अब नए के खिलाफ भी वही माहौल बनाने में जुटे हैं। दूर-दराज से साहब से मिलने पहुंचने वालों से पहला सवाल होता है- मिठास वाला काम है या खजाने वाला।
दरअसल उनके साहब दोनों ही विभागों के मुखिया हैं। आगंतुक जिस विभाग से जुड़े होते हैं, द्वारपाल उन्हें साहब के दूसरे विभाग के लोगों के साथ व्यस्त होने का हवाला देकर टरकाने की कोशिश करते हैं।
कई बार तो खुद ही उनके काम और शिकायत की जानकारी करने लगते हैं। फिर उनका काम विभाग के जिस अनुभाग से जुड़ा होता है, वहां के कर्मचारियों को फोन कर बताते हैं कि साहब के पास तुम्हारी शिकायत आ गई है।
सेक्शन का अफसर शिकायतकर्ता को अपने पास भेजने को कह देता है और फिर शुरू हो जाता है खेल। द्वारपालों की यह मनमानी सियासी गलियारे में चर्चा का विषय बनी हुई है।