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B'day: गोपाल दास 'नीरज' ने खोले प्रेमिकाओं से जुड़े राज

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‘इतने बदनाम हुए हम तो इस जमाने में, तुमको लग जाएंगी सदियां हमें भुलाने में’। पिछली सदी से लेकर इस सदी तक हिंदी कवि सम्मेलनों के मंच पर सबसे ज्यादा तालियां बटोरने वाले गीतों के राजकुमार पद्मभूषण गोपाल दास नीरज की शख्सियत कुछ ऐसी ही है।
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प्रेम और दर्द में लिपटे उनके गीतों ने कई दशक तक श्रोताओं के दिलों पर राज किया। हालांकि ‘नीरज’ बनना इतना आसान नहीं होता। उनके गीतों पर झूमने वाले बहुत से श्रोता भी यह नहीं जानते कि नीरज ने जीवन के अनगिनत झंझावातों केबीच संघर्षं की लंबी गीतमाला को सुरों की साधना से कैसे जीवंत बनाए रखा।

मुफलिसी में पले-बढ़े, पर कविताओं का दामन कभी नहीं छोड़ा। उम्र के इस पड़ाव पर भी काव्यपाठ का उनका उत्साह आज भी बरकरार है। ‘पद्मश्री’ ‘पद्मभूषण’, ‘भारत भारती’, ‘यश भारती’ सहित फिल्म फेयर व लाइफटाइम एचीवमेंट अवार्ड से सम्मानित नीरज सोमवार को 92वें वर्ष के पूरे हुए।
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यूं शुरू हुआ काव्यपाठ का सिलसिला

नौवीं कक्षा में था। एटा में कवि सम्मेलन था, जहां बलबीर सिंह रंग काव्य पाठ कर रहे थे। मैं उनसे प्रभावित हो गया। हालांकि उससे पहले मेरी कविताएं सुर्खियां बटोर चुकी थीं। पढ़ाई के साथ नौकरी और कवि सम्मेलनों का दौर कानपुर से शुरू हुआ।

फिर माखनलाल चतुर्वेदी व हरिवंश राय बच्चन का साथ मिला। उन्होंने मुझे काफी प्रोत्साहित किया। फीरोजाबाद में मुझे काव्यपाठ के लिए पहली बार 5 रुपये मिले। वहां मैंने ‘मुझको जीवन आधार नहीं मिलता है, आशाओं का संसार नहीं मिलता है’ रचना पढ़ी थी।

फिर कोलकाता के अकाल में जिन कवियों ने नि:शुल्क काव्य पाठ किया, उसमें मैं भी शामिल था। मेरा मानना है कि ‘आत्मा के सौंदर्य का शब्द रूप है काव्य, मानव होना भाग्य है कवि होना सौभाग्य।’

कविता का असली तत्व यह है कि जब हमें लगता है कि हमने सब कुछ जान लिया है तो पता लगता है कि हम कुछ नहीं जानते।

कभी रिक्शा चलाया, कभी निकाले यमुना से सिक्के

संघर्ष के दिनों को याद करते हुए नीरज कहते हैं, ‘छह साल का था, जब पिता गुजर गए। फूफाजी हमें एटा ले गए। वह मां को हर महीने 5 रुपये भेजते थे। एक दिन फूफाजी के यहां शादी में चेन चोरी हो गई तो हम पर शक किया गया।

हमारी किताबों की तलाशी ली गई। यह बात मुझे चुभ गई। मैं मां के पास इटावा चला गया। घर का खर्च चलाने के लिए मैंने रिक्शा चलाया, बच्चों को ट्यूशन दी, पान-बीड़ी बेची। यमुना में डुबकी लगाकर पैसे निकाले’।

मोहब्बत की राह में आड़े आ गई गरीबी

‘खुशी जिसने खोजी, वो धन ले के लौटा। हंसी जिसने खोजी, चमन ले के लौटा। मगर प्यार को खोजने जो गया वो, न धन ले के लौट, न मन ले के लौटा।’

पंक्तियों से अपने प्यार की दास्तां को याद करते हुए वे कहते हैं, ‘एटा में पहली बार प्यार का अनुभव हुआ, लेकिन वो प्यार इतना गहरा नहीं था कि मेरी गरीबी को तोड़कर संबंधों में तब्दील हो जाता।

खैर, उस लड़की की शादी हो गई और मैं मायूस रहने लगा। कई साल बाद उससे दोबारा मुलाकात हुई। वह बेहद परेशानहाल थी। हमने पुरानी यादें साझा कीं। इसके बाद मुंबई में एक लड़की से प्यार हुआ, जिसने मुझे प्रेमपत्र दिए।

उन पत्रों को मैंने अपनी किताब ‘नीरज की पाती’ में शामिल किया। हालांकि, बाद में एहसास हुआ कि गलत प्रेम में पड़ा रहा।
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...जब प्रशंसक ने निकाली पिस्तौल

कवि सम्मेलनों में कई बार ऐसे प्रशंसक मिलते हैं, जिसकी उम्मीद नहीं होती। एक बार लखनऊ विश्वविद्यालय में कवि सम्मेलन था।
मैंने डिमांड पर अंग्रेजी कविता सुनाई तो कुछ लोगों ने विरोध शुरू कर दिया। कहा कि हिंदी के कवि सम्मेलन में अंग्रेजी रचनाएं नहीं चलेंगी। मैं घबरा गया।

इसी दौरान एक प्रशंसक हवा में पिस्तौल लहराता हुआ खड़ा हुआ और बोला- ‘अंग्रेजी कविता जरूर होगी’। बाद में पता चला कि वो मथुरा का रहने वाला है। खैर, मैंने करीब दस अंग्रेजी कविताएं सुनाईं।

डाकू मानसिंह भी हुआ मुरीद

वर्ष 1955 में मैं अलीगढ़ के डीएस कॉलेज में प्रवक्ता था। काव्यपाठ के लिए भिंड गया था। वहां से जीप में लौटते समय रास्ते में डीजल खत्म हो गया। वो इलाका डाकुओं का था। इससे पहले कि कुछ सूझता, दो राइफलधारी आ धमके।

वे मुझे टेढ़े-मेढ़े रास्तों से एक गांव में ले गए, जहां डाकू मानसिंह था। मानसिंह ने मुझसे भजन सुनाने को कहा। मैंने दो भजन सुनाए, जिससे मानसिंह भाव-विभोर हो गया। उसने सौ रुपये मुझे दिए और डीजल का बंदोबस्त भी करवाया।

फिल्मों में आना महज इत्तेफाक

फिल्मों में जाने का मेरा कोई विचार नहीं था। यह महज इत्तेफाक है। हां, देवानंद, राजकपूर और मुकेश से मेरी काफी करीबी रही। दरअसल 1966 में एकल काव्यपाठ के लिए मुंबई गया था। आयोजन के बाद आर. चंद्रा ने फिल्म ‘बरसात की एक रात’ व ‘नई उमर की नई फसल’ के लिए गीत लिखने को कहा। इसी के बाद यह सिलसिला शुरू हो गया।

रॉयल्टी घटना गीतकारों के लिए दुर्भाग्यपूर्ण
‘जीवन की बगिया महकेगी, लहकेगी, चहकेगी। थोड़ा हमारा, थोड़ा तुम्हारा, आएगा फिर से बचपन हमारा।’ तेरे मेरे सपने फिल्म के इस गीत के लिए देवानंद ने 1500 रुपये दिलवाए थे। बाद में ऐसे ही गीतों से लाखों रुपये की रॉयल्टी मिलती रही। पिछले साल तक करीब चार लाख की रॉयल्टी मिलती थी, लेकिन नए नियमों के आने के बाद से रॉयल्टी की आधी रकम प्रोड्यूसर को जाने लगी। ऐसे नियम गीतकारों के लिए अच्छे साबित नहीं होंगे।

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