ये खबर नहीं उनके मुंह पर करारा तमाचा है, जो बेटे और बेटी में भेद करते हैं। उनके लिए पछतावे का सबब साबित होगी, जिन्होंने एक बेटे की चाहत में गर्भ में पल रही बेटी का गला घोंट दिया था। मिसाल कायम करने वाली गोंडा की ये बहनें काल की रफ्तार तो न रोक सकीं लेकिन पिता के कर्मकांड को सनातन व वैदिक विधि-विधान से पूरा रहीं हैं। बेटा-बेटी में कोई फर्क नहीं होता। यह केवल रूढि़वादी मानसिकता है। बेटियों को बेटा कहकर पुकारने वाले पिता अब इस दुनिया में नहीं हैं। लेकिन उनकी प्रेरणा से बेटियां बेटे का फर्ज निभा रही हैं। पहले अंतिम संस्कार किया और अब आंख में आंसू समेटकर पिता का कर्मकांड कर रही हैं। यह देखकर हर किसी की आंखें नम हो जाती हैं।