किशोरियों और युवतियों पर बढ़ता अत्याचार चिंता में डालने वाला है। केजीएमयू चिकित्सकों के अटॉप्सी अध्ययन के अनुसार लखनऊ जिले में अप्राकृतिक मौत की शिकार हो रहीं हैं।
महिलाओं में 62.5 प्रतिशत 16 से 30 साल के बीच होती हैं। अध्ययन बढ़ते पारिवारिक कलह, ससुराल पक्ष की क्रूरता की ओर इशारा करता है।
यह अध्ययन शोधार्थी डॉ. सचिल कुमार ने विभिन्न वरिष्ठ चिकित्सकों के साथ 2 मई 2011 से 1 मई 2012 के दौरान राजधानी में हुई महिलाओं की अप्राकृतिक मौतों पर किया।
इसमें पैथालॉजी विभाग के डॉक्टर यूबी सिंह, वाहिद अली, एस कुमार, ए पांडेय, एके वर्मा आदि शामिल रहे। अध्ययन में यह भी सामने आया कि मृत युवतियों में से ज्यादातर हिंदू गृहणियां थीं, जो अपने विवाह के 7 वर्ष भी पूरे नहीं कर सकी थीं।
यह तथ्य इशारा करता है कि लखनऊ में दहेज हत्याओं का दौर अब भी जारी है और युवतियां इसकी शिकार बन रही हैं। डॉ. सचिल कहते हैं कि यह एक साल का अटॉप्सी अध्ययन है।
इसे तैयार करने में साढ़े 4 सौ से ज्यादा अटॉप्सी रिपोर्ट्स के अध्ययन के साथ-साथ मृत युवतियों के घरवालों और पुलिस से भी जानकारी हासिल की गई।
इस बारे में डॉ. यूबी सिंह ने कहा कि अध्ययन के परिणाम इस लिहाज से महत्वपूर्ण हैं कि युवा लड़कियों की मौत के कारणों को समझा जाए और इन्हें कम करने में समाज योगदान दे।
अध्ययन से जुड़ी खास बातें
इस दौरान केजीएमयू मॉर्चरी में कुल 730 महिलाओं और लड़कियों के शरीर की अटॉप्सी की गई, जो राजधानी में अप्राकृतिक मौत की शिकार बनी थीं।
क्यों मर रहीं बेटियां
अध्ययन के अनुसार पारिवारिक झगड़ों, ससुराल पक्ष की क्रूरता, नए परिवार में एडजस्टमेंट की समस्या से उपजा तनाव कहीं न कहीं प्रमुख वजह बना कम शिक्षा, बेरोजगारी, ससुराल पक्ष पर निर्भरता, बांझ होना, प्यार में असफलता जैसे कारण भी सामने आए।
वहीं, कुछ मामलों में लड़कियों की हत्या कर दी गई या उन्होंने आत्महत्या कर ली थी। हादसों की अधिकतर घटनाएं जलने को लेकर थीं, जो संदेहजनक है
हादसे संदेहजनक
अध्ययन के अनुसार 456 मौतों में से 240 मौतें हादसों की वजह से हुई। इस पर वीमेन एक्टिविस्ट स्मृति सिंह कहती हैं कि हमारे समाज में आज भी प्रेम प्रसंगों में तथाकथित सम्मान की खातिर लड़की की हत्या होती है।
आग के घरेलू हादसों में भी लड़कियां और नवविवाहिताएं ही शिकार होती हैं। ये सभी चीजें हादसों में हुई अप्राकृतिक मौतों की बात पर संदेह पैदा करती है।
इन मामलों की विस्तृत जांच होनी चाहिए, क्योंकि अधिकतर मामले अनरिपोर्टेड ही रह जाते हैं। पूरी पड़ताल होगी तभी सामने आएगा कि हादसों में कितने वास्तविक थे।