...नर्म बिस्तर ...एयरकंडीशंड बेडरूम ...सुबह की कॉफी ...लंच और डिनर में फेवरेट इटैलियन डिश ...आसपास घूमते नौकर और चेले-चपाटी। चंद घंटों पहले गौरव शुक्ला की यही जिंदगी हुआ करती थी। लेकिन अब जेल में पथरीली जमीन का बिछौना है।
लंच-डिनर में साधारण दाल-रोटी है। एसी की जगह खिड़कियों से आती गरम हवा है। जो गौरव के लिए एक-एक पल किसी सजा से कम नहीं है। बृहस्पतिवार को जेल में उसकी पहली सुबह खासी तनावभरी रही।
चेहरे पर उदासी और छटपटाहट साफ नजर आ रही थी। गुमसुम हालत में वह मुलाहिजा बैरक (कोरेंटाइन ब्लॉक के क्यू चार बैरक) के एक कोने में ही बैठा रहा। गिनती का वक्त आया तभी वह अपनी जगह से हिला। उसने चाय पी न ही नाश्ता किया। नहाया भी नहीं। दोपहर को अरहर की दाल, रोटी, चावल और सूखी सब्जी दी गई लेकिन उसने भोजन की तरफ देखा तक नहीं।