पद भी हैं और अधिकारी भी, लेकिन सरकार को न खाली पदों की चिंता है न ही खाली बैठे अफसरों की परवाह।
एडीजी से लेकर एसएसपी तक के एक-दो नहीं बल्कि 18 से अधिक अधिकारी अपनी तैनाती की बाट जोह रहे हैं। जानकारों के मुताबिक तैनाती में सियासी समीकरणों का पेंच है।
अलग-अलग पदों के लिए होने वाली तैनाती में पंचम तल से लेकर मुख्यमंत्री आवास तक का सीधा दखल होता है।
अंतिम निर्णय हालांकि मुख्यमंत्री का होता है लेकिन कई बार बीच के लोग भी अपने लोगों की तैनाती कराने में कामयाब हो जाते हैं। सियासी खांचे में फिट न होने की वजह से अफसरों की तैनाती का मामला दिन पर दिन टलता आ रहा है।
डीजी सुब्रत त्रिपाठी हों या डेपुटेशन से लौटे अपर पुलिस महानिदेशक नासिर कमाल, या फिर पिछले दिनों एडीजी कानून-व्यवस्था के पद से हटाए गए अरुण कुमार, सभी डीजीपी मुख्यालय से संबद्ध हैं।
ऐसे ही आईजी से प्रोन्नति हासिल कर एडीजी बने डीएल रत्नम, विश्वजीत महापात्र, डीएस चौहान, जीएल मीना, कमल सक्सेना या आरके विश्वकर्मा, किसी को भी उनके पद के अनुरूप तैनाती नहीं मिली है।
ये सभी अधिकारी अब भी आईजी के पद पर काम कर रहे हैं। नासिर कमाल जब से डेपुटेशन से लौटे, उन्हें तैनाती नहीं दी गई है।
ऐसे ही डीआईजी से आईजी बनने के बाद भी अभी तक डीके ठाकुर और असीम अरुण को नई तैनाती नहीं दी गई है। वे डीआईजी के पद पर ही काम कर रहे हैं।
वहीं कुंभ में मची भगदड़ के बाद डीआईजी रेलवे के पद से हटाए गए लालजी शुक्ला को स्थानापन्न व्यवस्था के तहत फिलहाल मिर्जापुर का प्रभार दिया गया है।
एसपी स्तर के भी कई अधिकारी तैनाती की प्रतीक्षा कर रहे हैं। इनमें बलिकरण यादव, विजय यादव, जेके शाही, अब्दुल हमीद, मंजिल सैनी, डीपी श्रीवास्तव और अमित पाठक शामिल हैं।
वहीं एसपी से डीआईजी बनने के बाद भी एसपी के पद पर काम कर रहे संजीव गुप्त, रमित शर्मा, नवनीत राणा, अनिल दास, अरुण कुमार गुप्त और विजय गर्ग को नई तैनाती की प्रतीक्षा है।
यह हालात तब हैं जबकि डीआईजी इंटेलीजेंस, डीआईजी सिक्योरिटी, डीआईजी जीआरपी लखनऊ जैसे कई पद खाली हैं। इसके अलावा पीएसी व अन्य शाखाओं में आईजी से लेकर एसपी तक के कई पद रिक्त हैं।