करीब दस साल तक लोकायुक्त रहे जस्टिस एनके मेहरोत्रा को मलाल है कि मंत्रियों, विधायकों व लोकसेवकों के खिलाफ उनकी जांच रिपोर्टों पर मौजूदा सपा सरकार में कार्रवाई नहीं हो रही है।
उनका मानना है कि पूर्व मुख्यमंत्री मायावती ने लोकायुक्त रिपोर्टों पर त्वरित एक्शन की परिपाटी शुरू की थी। तत्कालीन मंत्री राजेश त्रिपाठी पर 48 घंटे में तो रंगनाथ मिश्रा व अवधपाल सिंह के खिलाफ 24 घंटे में ही एक्शन हुआ। वहीं, मौजूदा अखिलेश सरकार की उदासीनता के चलते लोकायुक्त की जांच रिपोर्टों पर कोई कार्रवाई नहीं हो पा रही है।
जस्टिस मेहरोत्रा ने कहा कि मंत्रियों, विधायकों व अन्य लोकसेवकों के खिलाफ शिकायतों की जांच करके उन्होंने सरकार को 125 से भी ज्यादा रिपोर्टें भेजीं, पर ज्यादातर पर कोई कार्रवाई नहीं हुई। यहां तक की राज्यपाल को भेजी गईं चार दर्जन से ज्यादा विशेष रिपोर्टों पर भी कोई एक्शन नहीं हुआ। जब तक सरकार की इच्छाशक्ति नहीं होगी, तब तक इन रिपोर्टों पर कार्रवाई नहीं हो सकती।
उनका मानना है कि अगर राज्य सरकार को कोई कार्रवाई ही नहीं करनी है तो लोकायुक्त का जांच करके रिपोर्ट भेजना ही बेकार है। उन्होंने कहा कि कई मामलों में तो जांच एजेंसियों ने तफ्तीश पूरी करके अभियोजन स्वीकृति तक मांग रखी है, लेकिन अखिलेश सरकार इनकी अनुमति नहीं दे रही। उल्टे लोकायुक्त को लोगों की नाराजगी जरुर झेलनी पड़ती है।
10 मंत्रियों को गंवानी पड़ी थी कुर्सी
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लोकायुक्त के इतिहास में जस्टिस मेहरोत्रा के कार्यकाल में ही भ्रष्टाचार के आरोप में सबसे ज्यादा 10 मंत्रियों को कुर्सी गंवानी पड़ी। उनकी रिपोर्ट पर मायावती सरकार के जिन मंत्रियों को कुर्सी छोड़नी पड़ी थी, उनमें धर्मार्थ कार्य राज्यमंत्री राजेश त्रिपाठी, पशुधन राज्यमंत्री अवधपाल सिंह यादव, माध्यमिक शिक्षा मंत्री रंगनाथ मिश्र, श्रम मंत्री बादशाह सिंह, अंबेडकर ग्राम विकास राज्यमंत्री रतन लाल अहिरवार व लघु उद्योग मंत्री चंद्रदेव राम यादव शामिल थे।
वहीं, वन मंत्री फतेह बहादुर सिंह, प्राविधिक शिक्षा राज्यमंत्री सदल प्रसाद, उच्च शिक्षा मंत्री राकेश धर त्रिपाठी को लोकायुक्त जांच के दौरान ही तत्कालीन मुख्यमंत्री मायावती ने मंत्रिमंडल से बाहर का रास्ता दिखा दिया। जस्टिस मेहरोत्रा एनआरएचएम घोटाले में फंसे पूर्व मंत्री बाबूसिंह कुशवाहा की भी जांच कर चुके हैं और उन्हें भी अपनी कुर्सी छोड़नी पड़ी थी।
नसीमुद्दीन सिद्दीकी
जस्टिस मेहरोत्रा ने 2012 के विधानसभा चुनाव के दौरान मायावती सरकार के सबसे कद्दावर मंत्री नसीमुद्दीन सिद्दीकी के खिलाफ भी सरकार को रिपोर्ट भेजकर सीबीआई और प्रवर्तन निदेशालय से जांच की सिफारिश की थी लेकिन मायावती ने इसे स्वीकार नहीं किया।
नतीजतन जस्टिस मेहरोत्रा ने नसीमुद्दीन की जांच रिपोर्ट दुबारा अखिलेश यादव सरकार को भेजी। अखिलेश सरकार ने इसे स्वीकार करके जांच शुरू करा दी है, लेकिन साढ़े चार साल बाद भी मामला जहां का तहां है।
राज्यपाल के जवाब तलब से फिर बना मुद्दा
लोकायुक्त जांच रिपोर्ट पर कार्रवाई न होने के मामले में राज्यपाल राम नाईक ने बुधवार को यूपी सरकार से पूछा था कि इन पर क्या कार्रवाई हो रही है। राज्यपाल के जवाब तलब के बाद जांच रिपोर्ट पर एक्शन में ढिलाई फिर मुद्दा बन गया।