सपा सरकार के दौरान सहकारी संस्थागत सेवामंडल के जरिये लगभग 1500 अलग-अलग पदों पर हुई भर्तियों में गड़बड़ी की चल रही जांच में सहकार भारती ने जांच अधिकारी को कई तथ्य उपलब्ध कराए हैं।
साथ ही जांच अधिकारी से इस भर्ती परीक्षा में हुई गड़बड़ियों का पता लगाने और भ्रष्टाचार में लिप्त अधिकारियों व कर्मचारियों के षड्यंत्र का पर्दाफाश करने के लिए सभी अभ्यर्थियों की ऑप्टिकल मार्क रिकगजिनेशन (ओएमआर) शीट की फिर से जांच कराने की मांग की है।
राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ से संबद्ध संस्था सहकार भारती का कहना है कि अधिकारियों ने चहेतों की भर्ती के लिए इस शीट में बड़े पैमाने पर गड़बड़ी की है।
सहकार भारती के महामंत्री वीरेंद्र पांडेय के मुताबिक, उन्होंने जांच अधिकारी विशेष सचिव सहकारिता जुनैद अहमद से ओएमआर शीट की फोरेंसिक जांच कराने की मांग की। उनका कहना है कि कई अभ्यर्थियों ने ओएमआर शीट में कूट रचना के आरोप लगाए हैं।
इस आरोप की जांच फोरेंसिक विशेषज्ञ ही कर सकते हैं। पांडेय के मुताबिक, कोऑपरेटिव बैंक की वे 53 नियुक्तियां भी उनकी तरफ से सहकारी संस्थागत सेवामंडल की तरफ से की गई नियुक्तियों में घपले और गड़बड़ी की शिकायतों में शामिल थी। इसके बारे में संसदीय कार्यमंत्री सुरेश खन्ना ने मुख्यमंत्री को लिखकर जांच कराने का आग्रह किया है।
मुख्यमंत्री व सहकारिता मंत्री पहले भी दे चुके आदेश
संस्थागत सेवा मंडल द्वारा सपा शासन में सहकारी संस्थाओं में हुई लगभग 1500 भर्तियों में गड़बड़ी की सहकार भारती द्वारा की गई शिकायत पर मुख्यमंत्री योगी आदित्यनाथ व सहकारिता मंत्री मुकुट बिहारी वर्मा जुलाई में जांच का निर्देश दे चुके हैं। पहले यह जांच अपर निबंधक सहकारिता नितीश कुमार को सौंपी गई थी। बाद में उनका मुख्यमंत्री कार्यालय स्थानांतरण हो जाने के कारण विशेष सचिव जुनैद अहमद को यह जिम्मेदारी सौंपी गई।
यह है मामला
सहकार भारती ने मुख्यमंत्री और सहकारिता मंत्री को की गई शिकायत में कहा था कि सपा सरकार में राम जतन यादव पहले सहकारी ग्राम्य विकास बैंक के प्रबंध निदेशक बनाए गए और फिर सहकारी सेवा मंडल के अध्यक्ष भी बना दिए गए। उन्होंने भर्तियों में काफी गड़बड़ी की है।
शिकायतों के अनुसार, वर्ष 2013 में उच्च न्यायालय के निर्देश पर सहकारी ग्राम विकास बैंक को मल्टी स्टेट संस्था का दर्जा देते हुए केंद्रीय सहकारिता निबंधक के यहां पंजीकरण कराया। फिर नियमों को धता बताते हुए खुद ही प्रस्ताव पारित कराकर मल्टीस्टेट संस्था के रूप में भी बैंक के प्रबंध निदेशक बन गए।
उन्होंने नई सेवा नियमावली भी बना डाली, पर तकनीकी दिक्कत आने से सहकारी ग्राम्य विकास बैंक का फिर राज्य स्तरीय संस्था में पंजीकरण कराया गया। नतीजतन 2013 की सेवा नियमावली निष्प्रभावी और 1976 की सेवा नियमावली प्रभावी हो गई। इस नियम के मुताबिक, संस्था के लाभांश का 25 प्रतिशत से अधिक धन प्रशासकीय मद में खर्च नहीं किया जा सकता, पर प्रबंध निदेशक ने लगभग एक हजार पद सृजित कर डाले। इसी बीच उन्हें सहकारी सेवा मंडल का अध्यक्ष बना दिया गया। वहां भी उन पर मनमाने तरीके से भर्ती करने के आरोप लगे।