चंद्रभानु गुप्त कांग्रेस के बड़े नेता थे। उन्होंने आजादी के आंदोलन में सक्रिय हिस्सा लिया। वह प्रदेश के मंत्री व मुख्यमंत्री रहे। लोगों को यह जानकर आश्चर्य होगा कि 1934 में जब पटना में सोशलिस्ट कांग्रेस की स्थापना हुई तो उसके संस्थापकों में चंद्रभानु गुप्त भी थे।
उस समय सोशलिस्ट कांग्रेस, कांग्रेस के भीतर वामपंथियों, सोशलिस्टों, कम्युनिस्टों का एक मिला-जुला मंच था। यह वह कालखंड था, जब डॉ. राममनोहर लोहिया, डॉ. जेडए अहमद तथा नंबूदरीपाद जैसे व्यक्ति सोशलिस्ट कांग्रेस के मंत्री हुआ करते थे।
चंद्रभानु गुप्त की आत्मकथा लिखने वाले प्रसिद्ध समाजवादी नंदकिशोर ने संस्मरण में लिखा है, ‘गुप्ता जी लखीमपुर खीरी से जब लखनऊ आए तो काफी तंग हाथ थे। साधारण कपड़े, पैरों में फटी चप्पल और एक पुरानी साइकिल से उन्होंने लखनऊ में अपना जीवन शुरू किया।
उनके मन में क्रांतिकारियों को लेकर अगाध श्रद्धा थी। वकालत की पढ़ाई पूरी कर चुके थे तो उन्हें जहां कहीं भी किसी क्रांतिकारी के पकड़े जाने की सूचना मिलती वहां पहुंचते और उनकी कानूनी मदद करते। उन्होंने लाहौर कांड, मेरठ षड्यंत्र केस, चटगांव, ढाका और काकोरी केस के क्रांतिकारियों की न सिर्फ कानूनी मदद की बल्कि इनकी आर्थिक मदद भी की।
मैंने एक बार उनसे पूछा, ‘उस समय तो आपके पास खुद ही धनाभाव था तो आप क्रांतिकारियों की मदद कैसे करते थे।’ गुप्त जी ने कहा, ‘तब स्वतंत्रता संग्राम को लेकर सभी की सहानुभूति थी। लखनऊ के व्यापारियों और रस्तोगियों में कोई खुलकर तो कोई छिपकर आर्थिक मदद करता था।
मैंने व्यापारियों से संपर्क किया और उनमें एक हजार लोगों को दस रुपये प्रति महीने देने को तैयार किया। इस तरह 10 हजार रुपये महीने एकत्र होने लगा, जिससे मैं क्रांतिकारियों और स्वतंत्रता संग्राम सेनानियों की मदद करता और जरूरत पड़ने पर उनके परिवारों की भी।’