वरिष्ठ पत्रकार और वर्ष 1983 के बाद संघ की देखरेख में इस आंदोलन को नए तेवर देने वाले रणनीतिकारों के नजदीक रहे वरिष्ठ पत्रकार सर्वेश सिंह के अनुसार गोरखपुर पीठ के महंत दिग्विजय नाथ, महंत अभिराम दास, बाबा राघव दास, रामचंद्र परमहंस और हनुमान प्रसाद पोद्दार ने 22-23 दिसंबर 1949 की रात संबंधित स्थल पर बाल स्वरूप श्रीराम की मूर्ति की स्थापना की।
इससे पहले पांचों लोगों ने रात में सरयू में स्नान किया और मूर्ति की पूजा कर प्राण प्रतिष्ठा की। हनुमान प्रसाद पोद्दार वही थे जिन्होंने धार्मिक ग्रंथों को सरल और सस्ते दामों में आम लोगों तक पहुंचाकर देश और प्रदेश में हिंदू संस्कृति के पुनर्जागरण को गीता प्रेस गोऱखपुर की स्थापना की। बहरहाल जिस समय यह घटना घटी तो के.के. नैयर फैजाबाद के जिलाधिकारी और सिटी मजिस्ट्रेट थे ठाकुर गुरुदत्त सिंह।
मुस्लिम पक्ष ने विरोध किया तो विवाद बढ़ गया। इसी के बाद नैयर और गुरुदत्त ने इस स्थान को कुर्क कर लिया। पर, शायद इन पांच रणनीतिकारों की योजना का कुछ हिस्सा बाकी था। गोपाल सिंह विशारद और रामचंद्र परमहंस ने फैजाबाद के सिविल जज के यहां मुकदमा कर मांग की कि दूसरे पक्ष को हिंदुओं की पूजा-अर्चना में बाधा डालने से रोका जाए। न्यायालय ने यह आदेश पारित कर दिया।
पांचों रणनीतिकारों ने इस आंदोलन के सहारे लोगों का जनजागरण करने के लिए न सिर्फ संबंधित स्थल पर कीर्तन शुरू कराया बल्कि मंदिर तोड़ने के पूरे घटनाक्रम की किताब छपवाई, जो लोगों को बांटी जाती थी। साथ ही इन पांचों लोगों की तरफ से जगह-जगह सभाएं करके लोगों को जगाने की कोशिश की गई।
पर, केरल में बड़े धर्म परिवर्तन के बाद राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ का ध्यान भी इन पांच लोगों की तरफ से शुरू कराए गये काम की तरफ गया। कांग्रेस के भी कुछ नेताओं ने साथ दिया और हिंदुत्व की चेतना पर व्यापक तरीके से काम करने की रणनीति पर काम शुरू हो गया।
आंदोलन के मुख्य शिल्पकार अशोक सिंहल कहते भी थे कि यह आंदोलन सिर्फ मंदिर निर्माण का नहीं बल्कि हिंदुत्व की सांस्कृतिक चेतना के पुनर्जागरण का है। जिसे पांच विभूतियों ने शुरू किया था ताकि फिर कभी कोई हमारे संस्कृति की पहचान पर प्रहार न कर सके।