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यूपी में क्यों 'पिटी' भाजपा, 3 बड़ी वजहें

Tue, 16 Sep 2014 04:01 PM IST
टीम डिजिटल/अमर उजाला, लखनऊ
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भाजपा ने यूपी में सियासी सेमीफाइनल जीतने के लिए पुरजोर कोशिश की। मुरादाबाद से लेकर लखनऊ तक जमकर हंगामा मचाया गया। कभी एक साथ 40 सांसद धरने पर बैठ गए, तो कभी लव जिहाद के नाम पर हंगामा काट दिया गया। पश्चिमी यूपी सियासी दांव-पेंच में सुलगता रहा, फिर भी 11 सीटों पर उपचुनाव के नतीजे भाजपा के खिलाफ क्यों चले गए।
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सवाल कई और भी हैं...

क्या इसे सियासी ब्लंडर मानेगी भाजपा? क्या शाह का यूपी के प्रदेश अध्यक्ष लक्ष्मीकांत वाजपेयी पर जरूरत से ज्यादा भरोसा करना सही था? क्या योगी आदित्यनाथ की फायरब्रांड छवि को भुनाना बड़ी भूल साबित हुआ? इन सबके जवाब में वाजपेयी भी अपने निवर्तमान अध्यक्षो की तरह समीक्षा करेंगे, लेकिन 2017 में क्या वे सपा का और मजबूत हो चुका दुर्ग भेद पाएंगे?

बहरहाल, उपचुनाव के निर्णायक रुझान इस बात की तस्दीक कर रहे हैं कि मोदी लहर मोदी के साथ चलती है। ये रुझान यह भी बता रहे हैं कि यूपी अब भी कट्टर हिंदूवादी विचारधारा से सामंजस्य नहीं बैठा पा रहा और भाजपा को जमीनी स्तर पर ज्यादा काम करने की जरूरत है।
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1: अबकी जोश नहीं भर पाए शाह!

अमित शाह शायद ये नहीं भूले होंगे कि भाजपा के राष्ट्रीय अध्यक्ष की गद्दी तक उन्हें यूपी ने ही पहुंचाया। मोदी के लिए जिस तरह शाह ने लोकसभा चुनाव के दौरान रणनीति बनाई, टीम तैयार की और हर सीट पर कार्यकर्ताओं की फौज से काम करवाया, वो उपचुनाव में कहीं नजर नहीं आया। आखिर क्यों?

जाहिर है, शायद भाजपा के लिए ये चुनाव अहम नहीं था। कुछ भी हो, हार से मुंह नहीं फेरा जा सकता। जिस यूपी ने शाह को शहंशाह बनाया, उसमें करारी हार का सेहरा भी शाह के सिर ही बंधना चाहिए। जवाबदेही शाह और वाजपेयी की टीम को ही देना होगा।

शाह को ये भी बताना होगा कि आखिर बड़े नेताओं ने मैदान में उतरना क्यों जरूरी नहीं समझा। शाह को इस सवाल का भी जवाब देना होगा कि 11 सीटों पर प्रचार के लिए भाजपा ने जिस तरह योगी आदित्यनाथ और क्षेत्रीय नेताओं पर भरोसा किया, वह कितना सही था? आखिर, सवाल तो उनकी नेतृत्व क्षमता का भी है।

2: ले डूबा जीत और जश्न का हैंगओवर!

अच्छे दिनों का नारा मोदी और भाजपाइयों ने खूब प्रचलित किया। लोकसभा चुनाव में जीत मिली तो यूपी के अच्छे दिनों की ओर इशारा किया गया। यूपी के भाजपाइयों को लगा कि उनके भी अच्छे दिन आ गए।

भाजपाइयों ने मुख्यमंत्री अखिलेश यादव पर हमला बोलने का एक भी मौका नहीं छोड़ा। बलात्कार और अपराध की अन्य घटनाओं की वजह से अखिलेश देशभर में सबसे बदनाम सीएम बनने लगे। मीडिया में भी यूपी क्राइम का गढ़ नजर आने लगा।

हालांकि, उपचुनाव में हर तरफ से घिरी समाजवादी पार्टी की जीत उनके लिए अच्छे दिन लेकर आ गई है। अब सपाई हावी होंगे और लोकसभा चुनाव में मिली जीत का हैंगओवर भाजपा नेताओं के सिर से उतर जाएगा।
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3: योगी पर खेला गया गलत दांव!

उपचुनाव के नतीजे भले ही भाजपा के कुछ अति उत्साही नेताओं के लिए मायने न रखें, पर निश्‍चित ही योगी आदित्यनाथ को मैदान में उतारना और लव जिहाद जैसे संवेदनशील मुद्दे पर सियासत करना भाजपा पर भारी पड़ा है।

भाजपा के कई नेताओं ने एक के बाद एक विवादित बयान दिए। धर्मांतरण पर बवाल मचाया। लव जिहाद देशभर में प्रचलित हो गया। दूसरी तरफ, भाजपा के ही कई वरिष्ठ नेता इस शब्द से किनारा करते रहे। साफ तौर पर दिख रहा था कि केंद्र और राज्य की इकाइयों में कोई तालमेल नहीं था।

ये चुनाव मोदी और उनकी टीम का न होकर, लक्ष्मीकांत बाजपेयी और उनकी टीम का नजर आया। मुरादाबाद में जबरदस्त तनाव बनाया गया, पर ठाकुरद्वारा पर भाजपा को करारी हार मिली। नतीजा समझा जा सकता है। सवाल ये है कि क्या अब भी भाजपा योगी को मुख्यमंत्री पद का दावेदार बनाना चाहेगी?
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