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यहां एक वोट का रेट 20 रुपये, पूरा परिवार 500 में!

Thu, 08 May 2014 07:47 AM IST
महेंद्र तिवारी/ अमर उजाला,लखनऊ
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सबसे ज्यादा दबंगों और बाहुबलियों वाले इस चरण में चुनावी समीकरण साधने के लिए कई सीटों पर प्रत्याशियों ने साम-दाम-दंड-भेद के सारे नुस्खे अपनाए।
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बुधवार को कैसरगंज से बस्ती तक के बूथों पर यह बात चर्चा का विषय रही कि मतदान के पहले वाली रात में वोट की कीमत ‘दाम’ से साधने के खूब खेल हुए।

वोट की कीमत 20 रुपये प्रति व्यक्ति से लेकर 500 रुपये प्रति परिवार तक पेश की गई।

लोग यहां तक कहते नजर आए कि जो दो दिन पहले तक किसी और का प्रचार कर रहा था, वोटिंग के दिन दूसरे की पैरवी करता नजर आया। इसके अलावा अगर अन्य क्षेत्रों में मतदान की बात करें तो यह भाजपा के पक्ष में नजर आ रहा है।
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मिलेगा भाजपा को लाभ

सूबे में लोकसभा चुनाव के पांचवें चरण में अवध और पूर्वांचल की जिन 15 सीटों पर बुधवार को मतदान हुआ, उनमें कई सीटों पर भाजपा ने कमल खिलाने का दम दिखाया है।

खास बात यह है कि पिछले चुनाव में भाजपा इनमें से एक भी सीट नहीं जीत पाई थी।

माना जा रहा है कि महंगाई और भ्रष्टाचार को लेकर कांग्रेस के खिलाफ लोगों में व्याप्त नाराजगी व भाजपा के प्रधानमंत्री पद के उम्मीदवार नरेंद्र मोदी की ताबड़तोड़ सभाओं की वजह से लगभग सभी सीटों पर पार्टी के प्रत्याशी मुख्य लड़ाई में आ गए हैं।

राहुल को कड़ी टक्कर

बुधवार की वोटिंग में कांग्रेस उपाध्यक्ष राहुल गांधी को अमेठी और कांग्रेस के प्रदेश अध्यक्ष निर्मल खत्री को फैजाबाद सीट पर भाजपा प्रत्याशियों क्रमश: स्मृति ईरानी व लल्लू सिंह से तगड़ी टक्कर मिलती नजर आई।

वहीं गोंडा में केंद्रीय मंत्री बेनी प्रसाद वर्मा तगड़ा त्रिकोण बनाने के लिए संघर्ष करते नजर आए।

बसपा प्रत्याशी भीष्म शंकर उर्फ कुशल तिवारी को संतकबीरनगर में भाजपा के पूर्व प्रदेश अध्यक्ष रमापति राम त्रिपाठी के बेटे शरद त्रिपाठी से तो सपा के कुंवर रेवती रमण सिंह इलाहाबाद में भाजपा के श्यामाचरण गुप्त से कड़े मुकाबले में उलझे दिखे।

कांग्रेस के कब्जे वाली सुल्तानपुर सीट पर भाजपा के राष्ट्रीय महासचिव वरुण गांधी ने तगड़ी लड़ाई लड़ी है तो कैसरगंज व श्रावस्ती में दिलचस्प त्रिकोणीय मुकाबला हुआ है।

भाजपा के पास नहीं था कुछ

हालांकि मतदाताओं ने अंतिम तौर पर क्या फैसला सुनाया है, यह 16 मई को ही पता चल सकेगा।

बताते चलें, वर्ष 2009 के चुनाव में कांग्रेस को इन 15 सीटों में से सर्वाधिक सात, बसपा को पांच और सपा को तीन सीटें मिली थीं।

भाजपा एक भी सीट नहीं जीत पाई थी, पर कथित मोदी लहर के बीच इस बार के चुनाव में तस्वीर हटकर नजर आ रही है।

जानकार बताते हैं कि लाख कोशिशों के बावजूद बसपा अपने आधार मत दलित और सपा अपने आधार मत यादव के साथ मुस्लिमों का एकतरफा ध्रुवीकरण नहीं कर पाई।

मुस्लिम वोटों का बंटवारा

भाजपा को हराने वाली पार्टी के तौर पर अपनी-अपनी पार्टी को पेश करने के बावजूद 15 में से नौ सीटों पर मुस्लिम वोटों का ठीक-ठाक बंटवारा नजर आया।

अधिकतर सीटों पर यह बंटवारा सपा और बसपा के बीच हुआ तो श्रावस्ती व गोंडा में पीस पार्टी ने भी हिस्सेदारी दिखाई।

ब्राह्मणों के बीच न तो सोशल इंजीनियरिंग का जादू नजर आया और न ही मोदी लहर का ज्वार। विधानसभा चुनाव में अच्छा समर्थन हासिल करने के बावजूद सपा भी उम्मीद के हिसाब से ब्राह्मणों को रोक नहीं पाई।

मुस्लिम और ब्राह्मण मतों का बंटवारा इनकी एकजुटता के सहारे समीकरण साधने वालों का गणित गड़बड़ा सकता है।
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काम आया पिछड़ी जाति का कार्ड

विश्लेषकों का मानना है कि इनमें से कई सीटों पर इस बिखराव का फायदा भाजपा को मिल सकता है।

कैसरगंज, श्रावस्ती, बस्ती व इलाहाबाद में सपा-बसपा-भाजपा प्रत्याशियों के बीच तगड़ा मुकाबला हुआ है तो अमेठी, फैजाबाद व प्रतापगढ़ में कांग्रेस और भाजपा आमने-सामने की लड़ाई में है।

बहराइच, गोंडा, सुल्तानपुर, श्रावस्ती जैसी कांग्रेस के कब्जे वाली सीटों पर भाजपा प्रत्याशी कांग्रेस को पीछे छोड़कर मुख्य मुकाबले में पहुंचते नजर आए।

कई सीटों पर पिछड़ी जातियों का भाजपा की ओर झुकाव भी नजर आया। फिलहाल मुकाबला कहीं सीधा, कहीं तिकोना तो कुछ स्थानों पर बहुकोणीय दिखा।
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