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ALERT: बच्चे को मूंगफली देने से पहले रखें सावधानी

Tue, 30 Dec 2014 04:56 PM IST
मनीष सिंह/अमर उजाला, लखनऊ
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दस माह के बच्चे की नादानी और घर वालों की अनदेखी से नौनिहाल की जान पर बन आई। खेल-खेल में बच्चे ने मूंगफली का छिलका निगल लिया जो सांस की नली में फंस गया। इसके चलते बच्चा बेहोश हो गया।
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घर वाले आनन-फानन बच्चे को लेकर निजी अस्पताल पहुंचे तो केजीएमयू में चीफ रेजिडेंट रहे युवा डॉक्टर ने छिलका निकाल कर बच्चे की जान बचाई।

इस तरह की सुविधा राजधानी के किसी सरकारी अस्पताल में उपलब्ध नहीं है। सिद्धार्थनगर के रहने वाले राम नरेश गुप्ता का दस महीने का बेटा ब्रह्मप्रकाश गुप्ता 24 दिसंबर, बुधवार को घर में अपनी बड़ी बहन के साथ खेल रहा था।

खेलते वक्त जमीन पर पड़ा मूंगफली का छिलका मुंह में डाल लिया। बड़ी बहन ने देखा तो घर वालों को बताया लेकिन किसी ने इस पर ध्यान नहीं दिया। थोड़ी देर बाद बच्चे की सांस तेज चलने लगी और वह अचानक बेहोश हो गया।
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परिवारीजन स्थानीय अस्पताल लेकर पहुंचे तो डॉक्टरों ने लखनऊ रेफर कर दिया। गंभीर हालत में परिवारीजन उसे लेकर महानगर स्थित एक ट्रस्ट के अस्पताल पहुंचे।
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ऐसे बचाई बच्चे की जान

केजीएमयू में चीफ रेजिडेंट रहे और चेस्ट रोग विशेषज्ञ डॉ. रवि प्रकाश ने बच्चे की जांच की और उसकी जान बचाने की कवायद शुरू की।

डॉ. रवि प्रकाश बताते हैं कि आमतौर पर इस तरह की घटना पर रिजिड ब्रांकोस्कोपी का प्रयोग होता था जिससे सांस की नली में फंसी चीज को निकाला जाता है।

रिजिड ब्रांकोस्कोपी में इस्तेमाल होने वाली रॉड से मुंह, सांस की नली के छिल जाती है और कई बार गंभीर मामलों में दांत तक टूट जाते हैं। वो बताते हैं कि दस महीने के बच्चे की जान रिजिड ब्रांकोस्कोपी से बचानी मुश्किल थी क्योंकि वह इसके दर्द को सहन नहीं कर पाता।

इसलिए फाइबर ऑप्टिक ब्रांकोस्कोपी तकनीक से बच्चे की जान बचाने की कवायद शुरू हुई। इसमें स्टील रॉड की जगह फाइबर की रॉड इस्तेमाल होती है। स्वांस नलिका में रॉड डालने के बाद उसमें लगे कैमरे से फंसी हुई चीज को देखा जाता है।

इसके बाद फाइबर ऑप्टिक रॉड को मूंगफली के छिलके के पास ले जाया गया और रॉड में लगे पोर्ट में छिलके को फंसाने के बाद निकाल लिया गया। करीब 50 मिनट तक चली प्रक्रिया के बाद बच्चे की जान बचाई जा सकी। बच्चे की हालत सुधरने के बाद 26 दिसंबर, शुक्रवार को डिस्चार्ज कर दिया गया।
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