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दाखिले के एक साल बाद तय हुई फीस, ब्रोशर में नहीं सूचना

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दाखिले के एक साल बाद तय हुई फीस, ब्रोशर में जानकारी नहीं
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लविवि में एमबीए फाइव ईयर के छात्रों की फीस ढाई गुना करने का मामला
लखनऊ विश्वविद्यालय नये पाठ्यक्रम संचालन के लिए प्रति कितना लापरवाह हो सकता है, इसका उदाहरण एमबीए फाइव ईयर कोर्स में देखने को मिला। विवि प्रशासन ने शैक्षिक सत्र 2016-17 से इसकी शुरुआत की। इसके एक साल बाद इसका ऑर्डिनेंस और फीस पास की गई। विवि ने पहले छह सेमेस्टर की फीस 30 हजार रुपये और बाकी के चार सेमेसटर में 75 हजार रुपये फीस तय कर दी। मगर इसकी सूचना दाखिला लेने वाले विद्यार्थियों को नहीं दी गई। इसकेबजाय विवि प्रशासन हर साल अपने दाखिले के ब्रोशर में सेमेस्टर की फीस 30 हजार रुपये ही दिखा रहा है। सातवें सेमेस्टर में दाखिला लेने वाले विद्यार्थियों को जब ढाई गुना ज्यादा फीस देने का फरमान सुनाया गया तो यह पूरा मामला खुला है।
विद्याथियों की शिकायत के बाद सोमवार को प्रति-कुलपति प्रो. राजकुमार सिंह ने जब वित्त विभाग से इसका रिकॉर्ड मंगवाया तो पूरा मामला साफ हुआ। प्रो. राजकुमार सिंह के अनुसार पाठ्यक्रम के लिए सातवें से 10वें सेमेस्टर तक फीस 75 हजार रुपये प्रति सेमेस्टर ही पास हुई है। यह गलती जरूर हुई है कि दाखिले के समय प्रॉस्पेक्ट्स में केवल 30 हजार रुपये सेमेस्टर फीस की ही जानकारी दी गई है। इसलिए कुलपति के लखनऊ आने पर इस मामले पर बैठक करके कोई फैसला किया जाएगा। इस मामले में एमबीए फाइव ईयर के विद्याथियों ने सोमवार को भी प्रति-कुलपति से मुलाकात की।
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इंटीग्रेटेड पाठ्यक्रम, फिर भी साल की बचत नहीं
विवि ने कोर्स डिजाइन करने में भी अजीब पैमाना अपनाया है। सामान्य तौर पर जब भी इंटीग्रेटेड कोर्स शुरू होता है तो फिर उसमें विद्यार्थी को 12वीं के बाद दाखिला मिलता है और उससे एक साल की बचत होती है। जैसे एलएलबी के इंटीग्रेटेड कोर्स में दाखिला लेने पर उन्हें पांच साल में एलएलबी की डिग्री मिल जाती है। जबकि स्नातक के बाद एलएलबी करने में कुल मिलाकर छह साल का समय लगता है। एमबीए फाईव इयर में 12वीं में दाखिला मिलता है, लेकिन उन्हें एमबीए की डिग्री पांच साल बाद मिलेगी। सामान्य तौर पर यह समय चार साल का होना चाहिए।
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वीसी के आने पर होगा फैसला
कुलपति इस समय लखनऊ से बाहर है। उनके वापस आने पर यह मामला सामने रखा जाएगा। एमबीए फाइव इयर के विद्यार्थियों के हित और नियमों को देखते हुए ही कोई फैसला किया जाएगा।
- प्रो. राज कुमार सिंह,
प्रति-कुलपित, लविवि
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