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मंदी में भी बेफिक्र हैं दो बीघा जमीन में खेती करने वाले रामभजन, इन्हें मिल रही है सब्जियों की अच्छी कीमत

Tue, 02 Jun 2020 12:35 PM IST
प्राची प्रियम अमर उजाला ब्यूरो, लखनऊ
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रामभजन पासी। - फोटो : amar ujala
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एक तरफ जहां लॉकडाउन के कारण सब्जी उत्पादक किसान परेशान हैं, वहीं शाहजहांपुर केमीर गांव के किसान रामभजन पासी मंदी की चिंता से मुक्त हैं। रामभजन के पास महज दो बीघा खेत है। इसी में उन्होंने कई सब्जियां उगाई हैं। वह ज्यादा पढ़े-लिखे तो नहीं हैं, लेकिन उन्हें इसकी बेहतर समझ है कि लोग क्या चाहते हैं। 

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वह सभी सब्जियां एक-साथ ले जाने के बजाय हर दिन एक ही सब्जी ले जाते हैं। उनके ग्राहक फिक्स हैं। इससे लोगों का टेस्ट बदलता है और रामभजन को बाजार के मुकाबले अच्छी कीमत मिल जाती है।

मोहम्मदी (लखीमपुर) से 30 किलोमीटर के फासले पर पुवायां (शाहजहांपुर) तहसील का गांव है मीरपुर। यह ग्राम पंचायत हरदुआ का मजरा है। अमर उजाला संवाददाता की इसी जगह पर रामभजन पासी से मुलाकात हुई। क्या फसल उगाते हैं? इस सवाल पर हंसते हुए रामभजन कहते हैं, आपको यकीन नहीं होगा। 
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वो बताते हैं कि मेरे पास करीब दो बीघा जमीन है। इस खेत के थोड़े-थोड़े हिस्से में बैंगन, तोरई, लौकी, मूंगफली, अरबी और चारा लगा रखा है। तीन गाय और दो बछड़े भी हैं। गायें अभी गाभिन हैं। जल्दी ही दूध देने लगेंगी।

रामभजन अपनी रणनीति को लेकर बताते हैं, मैंने अपनी ग्राम पंचायत और आसपास में पहले से ही ग्राहक बना रखे हैं। एक दिन बैंगन और तोरई तोड़ता हूं, तो अगले दिन लौकी। बदल-बदलकर सब्जियां ले जाने से हमारे ग्राहकों का स्वाद बदलता रहता है। उन्हें ऊबन नहीं होती। 

मांग बनाए रखने के लिए भी यह जरूरी है। वे कहते हैं कि अरबी के दाम लॉकडाउन में भी कम नहीं हुए। इस फसल में मेहनत थोड़ी ज्यादा होती है, इसलिए लोग इसकी खेती नहीं करते हैं। मुझे ये पता है इसलिए मैं करता हूं।

रामभजन बताते हैं कि उनके दो शादीशुदा बेटे हैं। कुल मिलाकर परिवार में 12 सदस्य हैं। रामभजन और उनके दोनों बेटे मनरेगा में भी मजदूरी करते हैं। खाने-पीने की ज्यादातर चीजें खुद ही पैदा करते हैं। थोड़ी बहुत जमीन बटाई पर भी ले लेते हैं, जिससे गेहूं, चावल व तेल की भी जरूरत पूरी हो जाती है। 

घर का कोई पुरुष शहरों में काम करने नहीं जाता? इस सवाल पर रामभजन कहते हैं, हमें इसकी जरूरत नहीं पड़ी। एकाध बार एक बेटा शौकिया तौर पर धान की रोपाई करने पंजाब जरूर गया, पर वहां मन नहीं जमा। गांव में ही काम करके हमारी जरूरतें पूरी हो जाती हैं।

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