बड़े साहब आखिरकार आखिरी कदम पर लड़खड़ा गए। अपने रिटायरमेंट के दिन खुद की पीठ थपथपाते हुए उन्होंने मातहतों को आदर्शवाद का ककहरा पढ़ाया।
उनका भाषण सुनकर कई मातहत बड़बड़ाते सुने गए कि खुद तो सब कुछ करते रहे, अब रिटायर हुए तो औरों को सीख दे रहे हैं।
वहीं, कुछ अधिकारियों ने कहा कि अब काफी सोच-समझ कर बयान देते हैं साहब। लेकिन बदकिस्मती का क्या करें, साहब जैसे ही आदर्श बघार कर मंच से नीचे उतरे उनके एक जूते का तल्ला उखड़ गया।
साहब कुछ लड़खड़ए पर फिर संभल गए। कुछ मातहतों के मुंह से बेसाख्ता निकल ही गया कब तक संभलते...आखिर लड़खड़ा ही गए।