30 जून को कई अफसरों-कर्मचारियों की नौकरी का आखिरी दिन रहा।
अंतिम दिन रविवार को पड़ा लिहाजा छुट्टी का दिन। ऐसे में कई विभागों के सहयोगियों-सहकर्मियों ने इनडोर कार्यक्रमों का आयोजन कर महीने के अंतिम कार्य दिवस 28 जून शुक्रवार को ही साहबों को विदा कर दिया।
उन्हें स्मृति के लिए निशानी भी सौंपी। मगर पिछड़े क्षेत्रों की तरक्की के लिए केंद्र से मिलने वाले पैसे में हुए घपलों के आरोपी एक साहब के साथ जैसा हुआ, वैसा शायद ही उन्होंने कभी सोचा होगा।
दरअसल वर्षों तक वह जिस विभाग में रहे वहां के मातहत डिप्टी सेक्रेटरी तक की विदाई अच्छे से की गई। मगर अपनी नौकरी के अंतिम दिन वह जिस विभाग में थे, न तो वहां उनकी विदाई का दिन किसी को याद रहा और न ही पहले वाले साथियों को।
साहब के साए की तरह नजर आने वाले एक डिप्टी कहते हैं कि जीवन का अच्छा-बुरा सब चला-चली की बेला में ही नजर आता है।
आज जब वह खुद ही तमाम आरोपों में घिरे हैं, कौन उनके साथ में खड़ा होना चाहेगा? अब तो वह नौकरी में भी नहीं रहे।