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बड़े दलों के लिए बने मजबूरी: सत्ता में आने पर छोटे दलों का परिवार ही असली लाभार्थी, जाति के आधार पर बने ये दल

Sun, 13 Mar 2022 03:09 PM IST
ishwar ashish सुधीर कुमार सिंह, अमर उजाला, लखनऊ

सार

जाति के आधार पर बने दल सत्ता में आते ही सबसे पहले अपने परिवार का भला करते हैं। उस समाज को भूल जाते हैं जहां से वो आते हैं। उनकी प्राथमिकता अपने परिवार को आर्थिक व सामाजिक सुरक्षा देना होता है।
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डॉ. संजय निषाद, अनुप्रिया पटेल व पल्लवी पटेल। - फोटो : amar ujala
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विस्तार
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उत्तर प्रदेश की सियासत में गठबंधन की राजनीति की छोटे दलों की बढ़ती अहमियत के अब मायने भी बदलते जा रहे हैं। समाज के उत्थान के नाम पर बड़े दलों के साथ गठबंधन करने वाले छोटे दल जब सत्ता में आते हैं तो समाज पीछे छूट जाता है और परिवार आगे आ जाता है। गठबंधन से होने वाले फायदे के सबसे बड़े लाभार्थी ऐसे दलों के मुखिया और उनका परिवार ही होता है। ऐसे दल चुनाव में उतरने से लेकर सत्ता बनने तक में सबसे पहले अपने परिवार को ही सियासी सुरक्षा कवच पहनाने का प्रयास करते हैं।

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दरअसल राजनीति में जिस प्रकार से जातिगत सियासत प्रभावशाली होती जा रही है, उसी प्रकार से जातिगत आधार गठित राजनीतिक दलों का वर्चस्व भी बढ़ता जा रहा है। सत्ता तक पहुंचने के लिए ऐसे जातिगत आधार पर गठित दलों को साथ लेना बड़े दलों की मजबूरी हो गई है। गठबंधन करते वक्त छोटे दलों के मुखिया अपने समाज की आर्थिक व सामाजिक सुरक्षा के लिए काम करने के वादे करते हैं, लेकिन जब टिकट बंटवारे या सत्ता में आने पर मंत्रिमंडल में स्थान पाने का मौका आता है तो वे सबसे पहले खुद या परिवार के सदस्यों को प्राथमिकता देते हैं। इस बार के चुनाव में भी ऐसे तमाम उदाहरण देखने को मिले हैं।

टिकट बंटवारे में समाज गायब
पहले बात निषाद पार्टी के अध्यक्ष डॉ. संजय निषाद की। यह खुद भाजपा कोटे से एमएलसी बने हैं। इससे पहले इनके बड़े बेटे प्रवीण निषाद भी भाजपा के ही सिंबल पर सांसद चुने जा चुके हैं। इस बार विधानसभा चुनाव में भी इन्होंने अपने छोटे बेटे श्रवण को भाजपा के सिंबल पर उस सीट से चुनाव लड़ाया जहां जीत पक्की थी। वहीं, संजय ने टिकट बंटवारे में समाज को नजरअंदाज किया। चौरी-चौरा से बेटे श्रवण और करछना से पीयूष निषाद के अलावा अपने कोटे के किसी सीट पर समाज को तरजीह नहीं दी।
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मंत्री पद के लिए पहले खुद
इसी प्रकार अपना दल (कमेरावादी) की अध्यक्ष कृष्णा पटेल ने बेटी पल्लवी के सियासत की सुरक्षा के लिए पार्टी के सिंबल पर न लड़ाकर सपा के सिंबल पर चुनाव लड़ाया। वहीं अपना दल (एस) की अध्यक्ष अनुप्रिया पटेल ने भी केंद्र में मंत्री बनने का मौका मिला तो खुद का नाम आगे बढ़ाया। 2017 के चुनाव में भाजपा से गठबंधन करने वाले सुभासपा के अध्यक्ष ओमप्रकाश राजभर भी इसी फॉर्मूले पर परिवार के सियासत की हिफाजत की थी। मौका मिला तो समाज के किसी सदस्य को आगे बढ़ाने के बजाय खुद मंत्री बने और बेटे अरविंद को राज्यमंत्री का दर्जा दिलाया था।

खुद के लिए ही करेंगे लॉबिंग
सूत्रों की माने तो अब नई सरकार के मंत्रिमंडल के गठन में भी भाजपा के दोनों सहयोगी निषाद पार्टी और अपना दल (एस) के प्रमुखों ने लॉबिंग शुरू कर दी है। माना जा रहा है कि जब मंत्रिमंडल में शामिल होने का मौका आएगा तो निषाद पार्टी के अध्यक्ष खुद और बेटे के लिए लॉबिंग करेंगे। अपना दल (एस) की अध्यक्ष की ओर से भी अपने पति का नाम ही आगे बढ़ाने की संभावना है।

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