नरेंद्र मोदी भले ही देश में नेशन फर्स्ट का मंत्र फूंकने की कोशशि में
हों, लेकिन खुद उनकी पार्टी और बाकी सभी पार्टियों में परिवार हावी हो गया
है।वैसे तो ‘वरासत’ विरासत में मिलती है, पर सियासी लोग इसका इंतजार कहां कर सकते हैं?
वंशवाद के सनातन आरोपों का सामना करने वाली कांग्रेस को छोड़ दें तो ‘पार्टी विद डिफरेंस’ वाली भाजपा हो या समाजवाद का नारा लगाने वाली सपा, परिवारवाद की परपंरा में पूरी तरह डूब-उतरा रहे हैं।
तस्वीर हटकर बसपा और लोकदल की भी नहीं है। सियासत में वहां भी एक-एक परिवार से कई-कई चेहरे नजर आने लगे हैं। 16 वीं लोकसभा के समर में विरासत की वंशबेलि कुछ ज्यादा ही विस्तार लेती नजर आ रही है।
सबने जनता नहीं परिवार को रखा आगे
बात सपा मुखिया मुलायम सिंह यादव के परिवार की करें या भाजपा अध्यक्ष राजनाथ सिंह की।
भाजपा के पूर्व प्रदेश अध्यक्ष रमापतिराम त्रिपाठी की चर्चा करें या बसपा नेता स्वामी प्रसाद मौर्य, राजधानी के सांसद लालजी टंडन की, मौका मिला तो पुत्रों-परिवारीजनों को आगे बढ़ाने में इन्होंने कभी देर नहीं की।
पूर्व मुख्यमंत्री कल्याण सिंह ने भी भाजपा छोड़ अपनी पार्टी बनाई तो पार्टी का दारोमदार अपने बेटे राजवीर सिंह के ही कंधों पर डाला।
इस बार बेटे को लोकसभा पहुंचाने के लिए एटा की अपनी सीट पर बेटे को भाजपा प्रत्याशी बनवाया है।
होड़ परिवार को संसद में बैठाने की
रालोद के मुखिया अजीत सिंह की पार्टी में नंबर दो उनके बेटे जयंत चौधरी ही हैं।
अब 16 वीं लोकसभा के मैदान में कांग्रेस हो या भाजपा, सपा हो अथवा बसपा, कई नेताओं में बेटे-बेटी, पत्नी या भाई को संसद में पहुंचाने की होड़ नजर आ रही है।
कई तो खुद भी ताल ठोकेंगे। पूर्व मंत्री बच्चा पाठक के भतीजे वीरेंद्र पाठक बलिया से तो पूर्व सांसद प्रत्याशी रहे रमेश शर्मा की पत्नी अनुराधा शर्मा झांसी से चुनावी समर में नजर आएंगी।
पूर्व सांसद फूलनदेवी के पति उम्मेद सिंह शाहजहांपुर से मैदान में ताल ठोक रहे हैं।
मुलायम: हावी होता दिखता परिवारवाद
समाजवाद पर परिवारवाद हावी होता दिखता है। सपा मुखिया मुलायम सिंह यादव खुद तो मैनपुरी से सांसद हैं ही, बहू, भाई और भतीजा भी साथ में संसद में गरजते नजर आते हैं।
बहू डिंपल यादव कन्नौज से सांसद हैं तो भतीजा धर्मेंद्र यादव बदायूं से। राज्यसभा में भाई प्रो. रामगोपाल यादव कमान संभालते हैं।
बात सूबे की करें तो बेटे अखिलेश यादव प्रदेश के मुख्यमंत्री हैं तो भाई शिवपाल सिंह यादव सिंचाई, राजस्व सहित कई विभागों के मंत्री।
शिवपाल के बेटे आदित्य यादव पीसीएफ के चेयरमैन हैं। इस बार प्रो. रामगोपाल यादव के पुत्र अक्षय यादव फीरोजाबाद से चुनाव लड़ने जा रहे हैं। यादव परिवार से एक साथ चार चेहरे लोकसभा के मैदान में नजर आएंगे।
संजय सिंह: पत्नी को बढ़ा दिया आगे
सुल्तानपुर के सांसद रहे संजय सिंह ने जब चाहा अपनी पत्नी अमिता सिंह को ही आगे बढ़ाया।
सुल्तानपुर और अमेठी में अच्छा प्रभाव रखने वाले संजय सिंह की इस बार सुल्तानपुर से सीट फंसती नजर आई तो भाजपा से नजदीकियों के चर्चे शुरू हो गए।
दांव इतना कारगर रहा कि कांग्रेस को उन्हें असम से राज्यसभा भेजना पड़ा।
मगर जब उनकी सीट पर दूसरे को टिकट देने का मौका आया तो अमिता सिंह ही नजर आईं।
इन दोनों का भी वही हाल
अजित सिंह : पश्चिम में जाट नेता अजीत सिंह किसान नेता चौधरी चरण सिंह की विरासत को आगे बढ़ाने का दावा करते हैं।
अजित सिंह की पार्टी रालोद में दूसरे नंबर पर उनके बेटे जयंत चौधरी ही हैं। अजित सिंह बागपत से चुनाव लड़ रहे हैं तो जयंत चौधरी मथुरा से।
बेगम नूरबानो : दो बार रामपुर की सांसद रही बेगम नूरबानो ने बेटे के साथ संसद में पहुंचने के लिए अपनी परंपरागत सीट छोड़ दी है।
उन्होंने अपने बेटे नवाब काजिम अली खां (नवेद मियां) को रामपुर से टिकट दिलवाया है। इस बार बेगम खुद मुरादाबाद से भाग्य आजमाएंगी। मां-बेटे दोनों कांग्रेस के प्रत्याशी हैं।
ये भी नहीं हैं पीछे
नसीमुद्दीन सिद्दीकी: नसीमुद्दीन सिद्दीकी बसपा के मुस्लिम चेहरा हैं। बसपा सुप्रीमो मायावती के खास लोगों में गिनती होती है। सिद्दीकी स्वयं विधान परिषद सदस्य और सदन में नेता प्रतिपक्ष हैं तो पत्नी हुमा सिद्दीकी भी एमएलसी हैं।
सिद्दीकी अब अपने बेटे अफजल सिद्दीकी को संसद में दहाड़ते देखना चाहते हैं। अफजल फतेहपुर से बसपा प्रत्याशी हैं।
आनंद सिंह: आनंद सिंह गोंडा से कई बार सांसद रहे। बेटे कीर्तिवर्धन सिंह को लोकसभा पहुंचाने के लिए खुद को गोंडा संसदीय क्षेत्र से अलग उन्हें आगे बढ़ाया।
कीर्तिवर्धन ने पिता के सपा सरकार में कृषि मंत्री रहते और उनकी असहमति के बावजूद टिकट के लिए भाजपा की ओर हाथ बढ़ा दिया। बेटे के इस कदम से आनंद सिंह को कृषि मंत्री की कुर्सी गंवानी पड़ी। वैसे अब कीर्तिवर्धन सिंह गोंडा से भाजपा के प्रबल दावेदार हैं।
ये भी चाहते हैं, बेटा नाम करे
स्वामी प्रसाद मौर्य: बसपा के राष्ट्रीय महासचिव स्वामी प्रसाद मौर्य पार्टी विधानमंडल दल के नेता हैं। मौर्य भी चाहते हैं कि उनका बेटा और बेटी राजनीति को ही अपना कॅरिअर बनाएं।
पिछले विधानसभा चुनाव में बेटे उत्कृष्ट मौर्य को रायबरेली की बछरावां सीट से सक्रिय राजनीति में पदार्पण कराया गया था तो बेटी संघमित्रा को मैनपुरी से।
दोनों जीत नहीं पाए थे। इस लोकसभा चुनाव में संघमित्रा मैनपुरी में मुलायम सिंह को चुनौती देने के लिए दिन-रात एक किए हैं।
बेगम तबस्सुम हसन: कैराना की मौजूदा सांसद बेगम तबस्सुम हसन की जगह बसपा को उनके देवर कमर हसन पर दांव लगाना पड़ा है। वजह ये कितबस्सुम के बेटे नाहिद हसन सपा से प्रत्याशी हो गए हैं।
कुछ दिन पहले ही 15वीं लोकसभा का अंतिम सत्र समाप्त होने के कुछ दिन पहले सपा का दामन थाम लिया। अब वे अपने बेटो को संसद में देखना चाहती हैं।
बेटे के लिए छोड़ दी सीट
रमापतिराम त्रिपाठी: भाजपा के पूर्व प्रदेश अध्यक्ष रमापतिराम त्रिपाठी पिछले लोकसभा चुनाव से ही बेटे को संसद में दाखिला दिलाने के लिए प्रयासरत हैं।
तिवारी ने बेटे शरद त्रिपाठी को 15 वीं लोकसभा का टिकट संतकबीरनगर से दिलाया था। शरद हार गए थे। अब एक बार फिर वह बेटे के टिकट के लिए जी-जान से जुटे हैं।
राजकुमारी चौहान: पूर्व मंत्री जयवीर सिंह की पत्नी राजकुमारी चौहान अलीगढ़ की मौजूदा सांसद हैं। अब राजकुमारी अपने बेटे अरविंद कुमार सिंह को संसद की ड्योढ़ी पार कराने के लिए मैदान से हट गई हैं।
सियासत में जमे पूर्व मंत्री और मौजूदा सांसद बेटे को संसद पहुंचा पाते हैं या नहीं, यह देखने वाली बात होगी।
इनके तो पत्नी, भाई सब पॉलिटिक्स में
बात हो रही है रामवीर उपाध्याय की। बसपा सरकार में बिजली जैसे अहम विभाग के मंत्री रहे रामवीर उपाध्याय की पत्नी सीमा उपाध्याय फतेहपुर से सांसद हैं।
इनके भाई मुकुल उपाध्याय विधान परिषद में एमएलसी हैं। मुकुल इस बार गाजियाबाद से चुनाव लड़कर अपनी भाभी के साथ संसद में दस्तक देना चाहते हैं। दोनों ही बसपा के प्रत्याशी हैं।