उसकी बातों पर भरोसा करके राजेंद्र बेटे को उसके क्लीनिक ले गए। वहां झोलाछाप ने उन्हें हर महीने 32 हजार रुपये की दवाएं दीं।सात महीने तक राजेंद्र ने बेटे का उपचार कराया, लेकिन ठीक होने के बजाए उसकी हालत बिगड़ती रही।
झोलाछाप की दवा से उसके गले में घाव हो गए तो राजेंद्र ने उपचार बंद करा दिया। उन्होंने क्लीनिक के बारे में पड़ताल की तो होश उड़ गए। पता चला कि झोलाछाप के पास क्लीनिक चलाने का लाइसेंस तक नहीं है।
इसके बाद उन्होंने थाना जाकर लिखित शिकायत की। इस संबंध में इटौंजा सीएचसी प्रभारी डॉ. संदीप सिंह से फोन पर संपर्क करने की कोशिश की गई, लेकिन उन्होंने कॉल रिसीव नहीं की।