केजीएमयू में हीमोफीलिया के मरीजों की जान बचाने के लिए चढ़ाया जाने वाला फैक्टर खत्म हो गया है। दो महीने पहले शासन से पांच लाख रुपये के फैक्टर खरीद के लिए मिले थे। लगभग डेढ़ हफ्ते में ही फैक्टर खत्म हो गया।
इसके चलते हीमोफीलिया के मरीजों के इलाज में संकट का सामना करना पड़ रहा है।
एक मरीज को एक बार में चार वायल लगभग एक हजार यूनिट फैक्टर देना होता है। एक बार में 12 हजार रुपये और साल भर में एक मरीज पर एक लाख से अधिक का खर्च होता है।
इलाज का पूरा खर्च राज्य सरकार उठाती है। लेकिन लगातार बजट न मिलने के कारण दिक्कतें आती रहती हैं। हीमोफीलिया में शरीर के रक्त का थक्का (जमना) बनाने की क्षमता खत्म हो जाती है।
इससे मरीज के शरीर में चोट लगने पर रक्त नहीं जमता और रक्तस्राव होने लगता है। ये रक्तस्राव आंतरिक और बाहरी दोनों हो सकता है। थक्का न जमने के कारण अत्यधिक रक्तस्राव से उसकी जान जोखिम में पड़ जाती है।
एंटी हीमोफीलिया फैक्टर देकर मरीज को बचाया जा सकता है। अधिकतर हीमोफीलिया पीड़ितों में एफ-8 और एफ-9 प्रोटीन की कमी होती है।
इन फैक्टर की कमी इंजेक्शन देकर दूर की जाती है। चोट बाहरी हो या अंदरूनी ये इंजेक्शन 15 मिनट में असर दिखाते हैं। इसमें एक बड़ी समस्या अपंगता की है।